मेरे पिता मेरे प्रथम आध्यात्मिक मार्गदर्शक (भाग -१)


श्रीगुरुने कहा है कि मुझे मेरा चरित्र लिखना है । मेरे माता-पिताकी सीखके बिना यह चरित्र अपूर्ण होगा; इसलिए मैंने, सर्वप्रथम अपने पिताजीसे क्या सीखा है ? उन्होंने कैसे मेरे व्यक्तित्वको संवारनेमें एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है ? इस लेखमालामें मैं यह बतानेका प्रयास करुंगी ।

मेरे पिता मेरे प्रथम आध्यात्मिक मार्गदर्शक
बाल्यकालसे ही मेरी वृत्ति जिज्ञासु थी । जब भी पिताजीको समय मिलता था तो वे हमें बहुतसे ज्ञानवर्धक तथ्य बताते रहते थे । वे एक सद्गृहस्थ थे एवं मां दुर्गाके उपासक थे । ‘आध्यात्मिक जीवन एक सामान्य गृहस्थ कैसे जी सकता है ?’ यह मैंने सर्वप्रथम उनसे ही सीखा है । यह लेखमाला उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु लिख रही हूं ।
नम्र स्वभाव
हमारे पिताजीका व्यक्तित्व तो बहुत तेजस्वी था; किन्तु वे बहुत ही नम्र थे । वे बडोंका आदर करते थे, सन्तोंके प्रति श्रद्धा रखते थे एवं सभीसे सीखते थे । उनमें सीखनेकी वृत्ति बहुत अधिक थी । हम भाई-बहन उन्हें ‘ऑल राउंडर’ कहते थे । हमने उन्हें, विविध प्रसंगोंमें, सहज भावसे, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र वर्णकी सेवा करते हुए देखा था । वे हमें भी सदैव ही विनम्र रहने एवं सतत सीखने हेतु कहते थे । उनकी विनम्रताके कारण वे सगे-सम्बन्धियों, मित्रों और पडोसियोंमें सबके प्रिय थे ।
पूर्वकालमें विवाहके समय सारी व्यवस्था कुटुम्बके सदस्य, मित्र या पडोसी किया करते थे । हमारे पिताजी उनके किसी भी परिजन या मित्रगणके विवाहके समय रसोई या भण्डारकी सेवाका उत्तरदायित्व सहज ही ले लेते थे । जहां सब लोग विवाहमें सज-धजकर बातें करते थे, वहीं मैंने सदैव ही पिताजीको सबके विवाह समारोहोंमें कठोर परिश्रम करते देखा था । वे अपनी सेवामें इतने मग्न रहते थे कि उन्हें ढंगसे वस्त्र पहननेका भी भान नहीं होता था । उनके रहते, कभी भी, किसीके भी विवाह समारोहमें, भोजन व्यवस्थामें कोई अडचन नहीं आई थी । उनके इस सेवाभावके कारण, सभी लोग विवाह समारोहमें उनकी बाट जोहते थे और उनके आते ही उन्हें सबसे महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व अर्थात अन्नपूर्णा कक्षका सौंप देते थे और वे भी उसे सहज भावसे स्वीकार कर लेते थे ।
उनमें सीखनेकी वृत्ति इतनी अधिक थी कि वे तकनीकी सेवा भी सरलतासे सीख लेते थे; इसलिए हम उन्हें ‘इंजीनियर’ (अभियन्ता) भी कहते थे । हम मध्यमवर्गीय थे; तथापि वे अपने कौशल्यसे हमें सब सुविधाएं देनेका प्रयास करते थे । इस हेतु घरमें वे भिन्न प्रकारसे, अनुसन्धानकर, हमें सुविधाएं उपलब्ध करवाकर देते थे ।
उनकी विनम्रताके कारण ही सभी उनसे प्रेम करते थे और एक बार कोई हमारे घरपर आ जाए या उनसे मिल ले तो वह हमारे कुटुम्बका सदस्य हो जाता था । चाहे वह उनका अधिकारी हो या कोई दूरका सम्बन्धी अथवा कोई भिखारी । हां ! भिखारी भी हमारे माता-पिताके प्रेमके कारण बार-बार हमारे घर आया करते थे ।
पूजा करते समय या प्रार्थना करते समय उनका विनीत भाववाला मुख आजतक मुझे भूलता नहीं है ।
उन्हें विभिन्न क्षेत्रोंके अनेक विषयोंका ज्ञान था एवं वे सतत कुछ नूतन सीखते या पढते रहते थे; किन्तु इसका उनमें लेशमात्र भी अहंकार नहीं था । विनम्रतारूपी गुण मैंने अपने पिताजीसे ही सीखा है ।
– (पू.) तनुजा ठाकुर, सम्पादक



Leave a Reply

Your email address will not be published.

सम्बन्धित लेख


© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution