३१२ रुपयोके लिए ४१ वर्षके पश्चात आया निर्णय, महिलाकी हो चुकी थी मृत्यु


सितम्बर ११, २०१८

देशकी विभिन्‍न न्यायालयोंमें लम्बित अभियोगका प्रकरण समय-समयपर उठता रहता है । अधिकांश इतने लम्बे चलते हैं कि उनके निर्णयकी प्रतिक्षा करते-करते लोगोंकी मृत्यु तक हो जाती है ! ऐसा ही प्रकरण मिर्जापुरमें सामने आया है । ‘टाइम्‍स ऑफ इण्डिया’में प्रकाशित समाचारके अनुसार यहांके प्रान्तीय न्यायालयमें केवल ३१२ रुपयेके शुल्कको लेकर एक प्रकरणमें ४१ वर्षोतक सुनवाई चली !

यह अभियोग एक महिलाने न्‍याय पानेके लिए लडा था; लेकिन अन्तमें जब न्यायालयने अपना निर्णय उसी महिलाके पक्षमें सुनाया तो वह इस धरापर ही नहीं है !  गंगा देवी नामकी उस महिलाकी मृत्यु २००५ में ही हो चुकी है ।

१९७५ में मिर्जापुर न्यायाधीशने भूमि विवादके एक प्रकरणमें गंगा देवीके विरुद्ध प्रॉपर्टी अटैचमेंटकी अधिसूचना जारी की थी ।  इसपर गंगा देवीने निर्णयको न्यायालयमें चुनौती दी थी । उस समय केवल ३७ वर्षीय गंगा देवीने न्‍यायके लिए लडाई लडी थी । इसके दो वर्ष पश्चात १९७७ में न्यायालयने गंगा देवीके पक्षमें निर्णय सुनाया; लेकिन उनकी परेशानी यहीं पर नहीं समाप्त हुई ।

जिला न्यायालयने उन्‍हें शुल्कके रूपमें ३१२ रुपये जमा करानेको कहा । गंगा देवीने यह राशि जमा करा दी; लेकिन जब वह उनके पक्षमें आए निर्णयकी प्रति लेनेके लिए न्यायालय पहुंची तो किसीने पाया कि उन्‍होंने लिखितपत्रोंमें ३१२ रुपयेकी पर्ची नहीं लगाई है ।  न्यायालयमें उनसे पुनः ३१२ रुपये देनेके लिए कहा; लेकिन उन्‍होंने इसे नकार दिया । इसके पश्चात न्यायालयमें इसी ३१२ रुपयेको लेकर ४१ वर्षोतक सुनवाई चली ।

सुनवाईमें सम्मिलित एक अधिवक्ताने बताया कि गंगा देवी पुनः ३१२ रुपये नहीं चुकाना चाहती थीं । उन्‍होंने बताया कि चार दशक पूर्व ३१२ रुपये कोई कम मूल्य नहीं था । गंगा देवीने इसका विरोध किया; लेकिन उनकी याचिका स्वीकृत नहीं हुई ।

जब यह प्रकरण मिर्जापुरकी सिविल न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) लवली जायसवालके समक्ष आया तो उन्‍होंने इसकी जांचमें पाया कि गंगा देवीकी ओर से ९ अप्रैल, १९७७ को शुल्क दिया गया था ! उन्‍होंने अपने निर्णयमें कहा, “मुझे लगता है कि यह अभियोग फाइल में किसी चूकके कारण चलता रहा; इसलिए अब इसका निस्‍तारण कर देना चा‍हिए ।”

 

“यह है हमारी न्याय व्यवस्था ! स्वतन्त्रताके पश्चात भी अंग्रेजोंका विधान (कानून) चल रहा है, जिसमें केवल भ्रष्टाचारियों और पूंजीपतियोंके लिए न्याय व समय है, साधारण जनता वहां कुछ नहीं है ।” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

 

स्रोत : जी न्यूज



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