मृत्यु उपरान्त साधनाका ही महत्त्व होता है


पूर्व कालमें गृहस्थ ५०-६० वर्षके पश्चात अपने सारे उत्तरदायित्वको अपनी युवा पीढीको सौंपकर साधनाको प्रधानता दिया करते थे । आजकल धर्मशिक्षणके अभावमें सेवानिवृत्त होनेके पश्चात कुछ व्यक्ति ‘हंसोड संस्थान’में (लॉफ्टर क्लब)  सहभागी होते हैं तो कुछ आजके नीतिशून्य, आदर्शहीन नेताओंकी चर्चा कर समय गंवाते हैं, तो कुछ ताशके पत्ते खेलने हेतु अपना गुट बना लेते हैं । वहीं कुछ दूरदर्शन संचपर खेलके भिन्न प्रकार और मायावी एवं तमोगुणी धारावाहिकोंको देखकर समय व्यर्थ कर देते हैं । कुछ व्यापारी जबतक शरीर कार्य करना न छोड दे, तबतक अपने कोषकी (तिजोरीकी) चाबी और उसके पैसेकी रखवाली करते रहते हैं । अर्थात इतना अनमोल मनुष्य जीवन यूं ही ‘हाय माया, हाय माया’ कर व्यतीत कर देते हैं । ध्यान रहे, जिसप्रकारके विचार आप सम्पूर्ण जीवन करेंगे, मृत्युके समय उसीप्रकारके विचारोंका अन्तर्मनमें प्राबल्य रहेगा । अतः कमसे कम वानप्रस्थमें पहुंचनेपर तो अपनी मृत्युकी पूर्वसिद्धता करें, क्योंकि मृत्युके समय और उसके उपरान्त मायाकी वस्तु और मान-सम्मानका कोई मोल नहीं होता; मृत्यु उपरान्त साधनाका ही महत्त्व होता है और वह ही साथ जाती है, क्योंकि वह सूक्ष्मतम होती है । शास्त्रोंमें भी कहा गया है –

अस्थिरं जीवितं लोके ह्यस्थिरे धनयौवने ।

अस्थिराः पुत्रदाराश्च धर्मः कीर्तिर्द्वयं स्थिरम् ॥

अर्थ : इस अस्थिर संसारमें धन, यौवन, पुत्र-पत्नी इत्यादि सब अस्थिर है । केवल धर्म, और कीर्ति ये दो ही बातें स्थिर हैं ।

अतः ‘कमसे कम’ वानप्रस्थ जीवनमें आनेपर तो धर्मपालन और साधना करें और अपनी स्थायी पूंजीको बढाएं !



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