मुस्लिम महिलाओंके ‘खतने’पर प्रतिबन्धके लिए उच्चतम न्यायालयमें याचिकापर धर्मगुरु बोले- इस्‍लामकी आवश्यक प्रथा !


जुलाई ९, २०१८

देशमें ‘तीन तलाक’पर प्रतिबन्ध और उच्चतम न्यायालयके निर्णयके मध्य अब मुस्लिम महिलाओंके ‘खतने’पर प्रतिबन्ध लगानेको लेकर भी अावाज उठने लगी है । इसे लेकर उच्चतम न्यायालयमें एक परिवाद दिया गया है, जिसपर न्यायालयने पूछा कि शरीरके साथ हिंसक छेडछाड क्यों होनी चाहिए ? किसी प्रथाके अन्तर्गत जननांगको स्पर्श करनेकी आज्ञा कैसे दी जा सकती है ? केन्द्रने उच्चतम न्यायालयको बताया कि कई देशोंमेें इस प्रथाको बन्द किया जा चुका है । भारतमें भी बन्द होनी चाहिए । यह पूर्ण रूपसे असुरक्षित है । वहीं, इसपर दाउदी बोहराकेे धर्मगुरूने वरिष्ठ वकील एएम सिंघवीके माध्यमसे कहा कि ‘खतना’ हमारे इस्लामकी आवश्यक प्रथा है । इस्लामके सभी पुरूष ‘खतना’ करवाते हैं, फिर महिलाओंपर प्रतिबन्ध क्यों ?

महिलाओंके जननांगोंको विकृत करनेकी इस परम्पराको ‘फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन’ (एफजीएम) कहा जाता है । साधारण भाषामें इसे ‘महिला खतना’ कहा जाता है । बोहरा समुदायमें लडकियोंकी अल्प आयुमें (६ से ८ वर्ष) ही ‘खतना’ करा दिया जाता है । इसमें योनीके बाहरी भागकी त्वचाको निकाल दिया जाता है । ‘खतना’के पश्चात हल्दी, उष्ण जल और औषधि लगाकर लडकियोंकी वेदनाको न्यून करनेका प्रयास किया जाता है । भारतमें ये दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदायके लोग गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगालमें रहते हैं । इस समुदायके लोग भारतमें सबसे अधिक शिक्षित समुदायोंमें से माने जाते हैं । इसके पीछे इनका मानना है कि ‘खतना’ करवानेके पश्चात महिलाओकी यौन इच्छाओंपर नियन्त्रण पाया जा सकता है । यह विवाहसे पूर्व किसी दूसरेके साथ सम्बन्ध नहीं बनाएंगी; लेकिन ‘खतना’के समय जो वेदना होती है, महिलाएं उसे जीवन भर नहीं भूल पाती ।

स्रोत : जनसत्ता



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