जुलाई १, २०१८
गंगाकी स्वच्छताको लेकर दी गई एक ‘आरटीआई’के उत्तरमें शासन ने कहा कि उसे नहीं पता गंगाकी स्वच्छताकी क्या स्थिति है । एक ‘आरटीआई’के उत्तरसे पता चला है कि शासन गंगाकी स्वच्छतापर अब तक ३८०० कोटि रुपये व्यय कर चुका है । तब प्रश्न उठता है कि स्वच्छता कहां-कहां हुई ? इतनी बडी राशि कहां-कहां व्यय हुई ?
गंगाकी स्वच्छताको लेकर अभियान चला रहीं कार्यकर्ता जयन्तीने शासनसे कहा कि गंगाकी स्वच्छताका बिगुल बजाए एक लम्बा समय व्यतीत हो गया है; लेकिन शासनने स्वच्छताके नामपर कुछ घाट चमका दिए हैं; लेकिन शासनके पास क्या गंगाके गिरते जलस्तरपर कोई उत्तर है ? गंगामें जमी गन्दगीको हटानेके लिए शासन कर क्या रहा है ? इसे हटाए बिना जलमार्गका विकास असम्भव है; क्योंकि गंगा जब तक अविरल नहीं होगी, निर्मल भी नहीं होगी !
प्रधानमन्त्री बननेसे पूर्व गंगाकी स्वच्छताको लेकर पीएम नरेन्द्र मोदीने कई दावे किए थे । गुजरातसे उत्तर प्रदेशके वाराणसी आए नरेन्द्र मोद ने सांसद प्रत्याशीके रूपमें गंगाको नमन करते हुए कहा था, “न मै यहां खुद आया हूं, न कोई मुझे लाया है, मुझे तो गंगा मांने बुलाया है ।”
मोदीके प्रधानमन्त्री बननेके बाद गंगाकी स्वच्छताके लिए ‘नमामि गंगे’ नामसे एक परियोजना लाई गई । इसका उत्तरदायित्व केन्द्रीय मन्त्री उमा भारतीको सौंपा गया; लेकिन गंगा अब तक निर्मल नहीं हो सकी !
अब, जब वर्तमान शासनके पांच वर्ष पूर्ण होनेमें एक वर्ष बचा है तो पीछे मुडकर देखनेकी आवश्यकता है कि शासनने गंगाकी स्वच्छताको लेकर चार वर्षमें किया क्या है ? यह जाननेके लिए जब एक ‘आरटीआई’दी गई तो उत्तरमें शासन स्पष्ट कह रहा है कि उसे पता ही नहीं, गंगा अब तक कितनी स्वच्छ हुई है ? ‘आरटीआई’ याचिकाकर्ता एवं पर्यावरणविद विक्रम तोगडे कहते हैं, “आरटीआईके अन्तर्गत यह ब्यौरा मांगा गया था कि अब तक गंगाकी कितनी स्वच्छता हुई है?; लेकिन शासन इसका कोई संख्या उपलब्ध नहीं करा पाई ।” वह कहते हैं, “शासन क्या इतनी बात नहीं जानती कि गंगामें गन्दे नालोंके पानीको जानेसे रोके बिना गंगाकी स्वच्छता नहीं हो सकती ! ‘नमामि गंगा’के अन्तर्गत शासनने गौमुखसे गंगा सागरतक जो भाग किया है, वहांकी स्थिति जाकर देखिए, काई, गाद और कूडेका ढेर देखनेको मिलेगा ! इसी तरह आप गढगंगा अर्थात गढमुक्तेश्वरकी स्थिति देख लीजिए । स्वच्छता हुई कहां है और हो कहां रही है ?”
पर्यावरणविद कहते हैं कि गंगाको लेकर ‘पॉलिटिकल विल’में वृद्धि तो हुआ है; लेकिन इस कार्यको विकेंद्रीकृत किए जानेकी आवश्यकता है । ‘एडमिनिस्ट्रेटिव अप्रोच’ अपनाए जानेकी आवश्यकता है । वह कहते हैं, “गंगामें जलकी न्यूनता है । इसकी सहायक नदियोंका अतिक्रमण हुआ है । स्वच्छताके नामपर व्यय अधिक हुआ है; लेकिन लाभ कहीं दिख नहीं रहा है ! कचरेके निपटानकी व्यवस्था करनी भी आवश्यक है । इसके लिए प्रशिक्षण दल तैयार करना होगा !”
पर्यावरणविद जयन्ती कहती हैं, “समस्या यह है कि अभी जो कार्य हो रहा है, उसका प्रभाव अगले तीन से चार वर्षोमें देखनेको मिलेगा; लेकिन तबतक और कूडा एकत्रित हो जाएगा । शासनको प्राकृतिक क्रियाको आरम्भ करनेकी आवश्यकता है; लेकिन लगता है कि शासन गम्भीर ही नहीं है !” वह कहती हैं, “शासनने २०२० तक ८० प्रतिशत गंगा स्वच्छ करनेका लक्ष्य रखा है; लेकिन अभी तक कितनी हुई है, इसका कोई ब्यौरा उपलब्ध नहीं कराया गया है । २०१९ में कितनी गंगा स्वच्छ करेंगे ?, इसका वर्णन भी किसी औरको नहीं, शासनको ही देना है ।”
स्रोत : न्यूज18इण्डिया
Leave a Reply