क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – ११)


कुछ लोग कहते हैं कि मेरी नामजपके प्रति श्रद्धा नहीं है; इसलिए मैं नहीं करता हूं । जैसे हम यदि कभी रुग्ण होते हैं और जिस चिकित्सकसे हम सदैव अपनी चिकित्सा करवाते हैं, उनसे यदि हमें कोई लाभ नहीं हो रहा हो और हमारे कोई शुभचिन्तक हमें ऐसे चिकित्सकका सुझाव देते हैं, जिसे हम नहीं जानते तो भी हम मात्र उनकी बातपर विश्वास करके उनके पास जाते हैं और यदि हम उनकी बताई चिकित्सा पद्धतिसे ठीक हो जाते हैं तो हमें उस चिकित्सकके विषयमें पुनः किसीसे कोई प्रशस्ति पत्र नहीं चाहिए होता है । वैसे ही नामजपके विषयमें विश्वास रखकर उसे करनेका प्रयास करना चाहिए और उसे नियमित करते रहनेसे स्वतः ही अनुभूतियां होती हैं और हमारी श्रद्धा बढ जाती है । संत तुलसीदास कहते हैं –
भायं कुभायं अनख आलस हूं ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूं ॥ – रामचरितमानस                                                             
अर्थ : अच्छे भावसे (प्रेमसे), बुरे भावसे (बैरसे), क्रोधसे या आलस्यसे, किसी प्रकारसे भी नाम जपनेसे दसों दिशाओंमें कल्याण होता है ।
अर्थात जिस प्रकार अग्निमें कोई भी वस्तुको हम जान बूझ कर डालें या वह अनजानेमें गिर जाए, अग्नि दोनोंको भस्म कर देती है; उसी प्रकार ईश्वरका नाम हम जिस भी भावसे लें, वह हमारा कल्याण करता ही हैं; अतः मेरी श्रद्धा बढेगी, तब मैं नामजप आरम्भ करूंगा या करूंगी, ऐसा न कर आज और इसी क्षणसे नामजप आरम्भ करें और उसे अखण्ड करनेका प्रयास करें ।



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