यदि प्रारंभिक अवस्थामें नामजप नहीं हो पाता और अत्यधिक विचार आते हैं तो उसके लिए हम क्या कर सकते है, यह जान लेते हैं |
१. पहले तो प्रयत्नपूर्वक १५ मिनट माला लेकर सात्त्विक स्थानपर, जैसे अपने पूजा घरमें या किसी मंदिरमें बैठकर नामजप करनेका प्रयास करें | साथ ही शारीरिक कार्य करते समय नामजप बोलकर करें | यदि संभव हो तो नामजप बोलते हुए लिख भी सकते हैं |
२. साप्ताहिक सत्संगमें जानेका प्रयास करें, सत्संगमें जानेसे नामजप करने हेतु, आवश्यक शक्ति मिलती है | और जैसे बिजलीके नहीं रहनेपर इन्वर्टर बिजलीकी भरपाई कर, हमारे उपकरणको चलाता है, उसी प्रकार सत्संगमें प्राप्त हुई सात्त्विकताका प्रभाव एक सप्ताह तक रहता है और हमें नामजप करनेकी शक्ति मिलती है | कलियुगके लिए सर्वोत्तम साधना मार्ग ईश्वरके नामका जप करना है | यद्यपि यह सुननेमें अत्यंत सरल लगता है; परन्तु इसे अखंड करनेके लिए हमारा अध्यात्मिक स्तर कमसे कम ४५% तो अवश्य ही होना चाहिए | वर्तमान समयमें साधारण व्यक्तियोंका आध्यात्मिक स्तर २० से २५% है और ऐसेमें नामजप करना कठिन होता है | वातावरणमें रज और तमके स्पंदनका प्रभाव अत्यधिक होनेके कारण भी मन एकाग्र नहीं हो पाता और नामजपमें सातत्य नहीं रह पाता | सतसंगमें जानेसे नामजपमें निरंतरता बनाने में किस प्रकार सहायता मिलती है, इस संदर्भमें एक अनुभूति देखेंगे | १९९९ में जब मैं झारखण्डके धनबाद जिलेमें धर्मप्रसारकी सेवा कर रही थी, तो उस दौरान दो स्त्रियां एक प्रवचनमें आई थी | दोनों सखी थीं | सत्संग सुननेके पश्चात दोनोंने नामजप आरम्भ भी किया | तीन महीनेके पश्चात जब मैं दोनोंसे एक साथ मिली, तो पता चला कि एक स्त्री, जो वहां आयोजित साप्ताहिक सत्संगमें नियमित जाने लगी थी, उनका नामजप अच्छेसे होने लगा था, और दूसरी स्त्रीका नामजप एक महीनेके पश्चात बंद हो गया था | दोनों ही स्त्री समस्तरी थीं, अर्थात दोनोंका अध्यात्मिक स्तर ४० प्रतिशत था | ५० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तरके नीचे नामजप अखंड होने हेतु, सत्संगमें अवश्य जाना चाहिए; अन्यथा नामजप करना और उसके प्रमाणको बढ़ाना कठिन होता है, यह ध्यानमें रखना चाहिए | साप्ताहिक सत्संगमें नियमित जाते रहनेसे आवश्यक चैतन्य हमें प्राप्त होते रहता है और हमारी आध्यात्मिक प्रगति हेतु पोषक शक्ति हमें प्राप्त होती रहती है |
३. नामजपमें संख्यात्मक एवं गुणात्मक वृद्धि हेतु हमें ईश्वरसे आर्ततासे प्रार्थना करनी चाहिए |
४. नामजपके समय आनेवाले विचारको कम करनेके लिए, अपने सदगुरु या कुलदेवताका चित्र अपनी दृष्टिके सामने रखना चाहिए, जिससे हमें अपना ध्येय सतत ध्यानमें रहे |
५. नामजप करते समय आनेवाले विचारोंको दूर करने हेतु, स्वयं सूचना देनी चाहिए | यह सूचना आप उन विचारोंके बारेमें दे सकते हैं, जो सबसे अधिक प्रमाणमें दिन भरमें आते हैं | इस हेतु आपको मनमें आनेवाले विचारोंका अभ्यास कर, अपनी दैनन्दिनीमें लिखें और लिखते समय कौनसे विषयके सम्बन्धमें विचार कितनी देर तक मनमें थे, इसका भी अभ्यास कर लिखेँ | हमारे शास्त्रोंमें कहा गया है – ‘मन एव मनुष्याणां कारण बंध मोक्षयो:’ अर्थात हमारा मन ही बंधन एवं मोक्षका कारण है | अतः मनका अभ्यास अध्यात्ममें आगे जाने हेतु करना आवश्यक है | मनका अभ्यास जितना अच्छा होगा, आप स्वयं सूचना भी उतनी ही सटीकतासे दे पाएंगे | अतः मनका अभ्यास आरम्भ करें |
आरम्भमें इस प्रकारकी स्वयं सूचना अपने मनको दे सकते है – “जब-जब मेरे मनमें अनावश्यक विचार आयेंगे, तब-तब मैं सतर्क हो जाउंगी, या हो जाउंगा और नामजप करनेका प्रयास करूंगा/करूंगी | यह वाक्य, जब नींदसे पलकें बोझिल होने लगे, तब दस बार दोहराकर सोयें |
इस प्रकारसे स्वयं सूचना देनेसे अंतर्मनको अनावश्यक विचार आनेके समय क्या करना है, इसकी दिशा मिलती है, और मन विचारोंमें लीन होनेके स्थानपर नामजप करने लगता है | इसी प्रकार आपको जिस विषयके सम्बन्धमें विचार आते हों, उनके सम्बन्धमें मनको योग्य सूचना देनी है, यह ध्यानमें रखना चाहिए | यदि अंतर्मनको अयोग्य सूचना मिली, तो मन वैसे ही वर्तन करेगा | अतः स्वयं सूचना देते समय मनको क्या दिशा देनी है, यह ध्यान रखना अति आवश्यक है |
६. नामजपके मध्यमें मनकी एकाग्रता साध्य करनेके लिए नमक पानीका उपाय भी अत्यधिक प्रभावकारी होता है | इस विषयमें पूर्वके ‘सोहम’ में बताया गया है |
७. घरके वास्तुको शुद्ध रखनेसे भी नामजप करनेमें सहायता मिलती है | – (तनुजा ठाकुर)
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