सर्वोच्च न्यायालयके न्यायाधीश रोहिंटन नरीमनने वेदोंपर की अपमानजनक टिप्पणी, ‘वर्ल्ड हिन्दू फाउण्डेशन’के संस्थापकने क्षमायाचना करनेको कहते हुए दी विवाद हेतु चुनौती
१९ अप्रैल, २०२१
न्यायाधीश नरीमनने १६ अप्रैल २०२१ को २६ वें सुनंदा भंडारे स्मृति व्याख्यानके कार्यक्रममें वक्तव्य देते हुए कहा कि ऋग्वेद कहता है कि महिलाओंसे मित्रता न करें, वे ‘हाइना’के समान होती हैं ।
इस टिप्पणीको ‘वर्ल्ड हिन्दू फाउण्डेशन’के संस्थापक स्वामी विज्ञानानंदने १.२ अरब हिन्दुओंका अपमान बताते हुए उनसे कहा कि वे अपने उथले वक्तव्यके लिए क्षमा याचना करें । इतना ही नहीं, उन्होंने न्यायाधीशको किसी भी स्थानपर इसपर चर्चा करने हेतु चुनौती दी । उन्होंने कहा कि अधिकतर लोग वेदोंका अंग्रेजी अनुवाद पढते हैं, जो कि तर्कसंगत नहीं है । वेदोंको समझनेके लिए सर्वप्रथम वैदिक संस्कृतका ज्ञान होना आवश्यक है । यह भाषा आधुनिक संस्कृतसे अनेक प्रकारसे भिन्न है । उन्होंने कहा कि वेदोंकी व्याख्या करने हेतु न्यूनतम ५ विषयोंका गहन अध्ययन आवश्यक है । ये विषय हैं, पाणिनि व्याकरण, निघण्टु, निर्कृट, प्रातिशाख्य, तथा ब्राह्मण ।
उन्होंने न्यायाधीशसे कहा कि आपमें वेदोंकी व्याख्या करनेकी अहर्ता नहीं है । न्यून स्रोतोंके आधारपर प्राचीन हिन्दू ग्रन्थोंकी व्याख्या करनेसे बचना चाहिए । आप देशकी न्यायपालिकाके उच्च पदपर आसीन हैं; अतः आपको इस देशके महान धर्म तथा संस्कृतिसे सम्बन्धित कोई भी वक्तव्य उथले ज्ञान अनुसार नहीं देना चाहिए ।
उन्होंने आशा व्यक्त की कि, न्यायमूर्ति वेदोंके प्रति अपने भ्रामक शब्द ‘वापस’ लेकर हिन्दू समाजसे क्षमा याचना करेंगे । उन्होंने कहा कि यदि न्यायमूर्तिको वेदोंके प्रति कोई संशय है, तो वे किसी भी ‘मंच’पर उनसे इस विषयपर चर्चा करनेकी चुनौती देते हैं ।
उल्लेखनीय है कि स्वामी विज्ञानानंद संन्यास आश्रममें प्रवेश करनेसे पूर्व भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानके (आईआईटी) प्रतिभाशाली छात्र रहे हैं । यान्त्रिकीके शिक्षण उपरान्त उन्होंने संस्कृतमें ‘पीएचडी’, पाणिनि व्याकरण, वेदांग, पूर्वी दर्शन, ब्राह्मण ग्रन्थ तथा वेद संहितापर अध्ययन शोध तथा अध्यापन किया ।
नरीमनने कहा कि ऋग्वेद महिलाओंको ‘हाइना’ समान बताता है । विदित हो कि हाइना वह प्राणी होता है, जो स्वयं आखेट नहीं करता तथा किसी अन्यद्वारा आखेटकर लाए हुए मृत प्राणियोंके भोजनके उपरान्त शेष मांसपर उदर निर्वाह करता है । प्राचीन संस्कृत भाषाके अज्ञानके कारण हमारे वेदोंके भाषान्तर अनेक स्थानपर किसी साधारण प्राचीन कथा समान प्रतीत होते हैं, जबकि वेद आध्यात्मिक ज्ञानका भण्डार हैं । वेदोंके गूढ, आध्यात्मिक अर्थसे भाषान्तर करनेवाले अनभिज्ञ होते हैं । एक भारतीय होनेके नाते हमारी इस महान ज्ञानकी सम्पदापर उथली टिप्पणी करनेके अपराधपर न्यायमूर्तिको हिन्दू समाजसे अवश्य क्षमा याचना करनी चाहिए । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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