मार्च ११, २०१९
अशासकीय संगठनोंको (एनजीओ) विदेशसे मिलनेवाले धनमें गत चार वर्षोंमें ४० प्रतिशतकी न्यूनता आई है ।
विदेशी परामर्शदाता ‘फर्म बेन एंड कंपनी’के अनुसार, नरेंद्र मोदी शासनमें गृह मन्त्रालयने १३ सहस्रसे अधिक ‘एनजीओ’के अनुमतिपत्र (लाइसेंस) निरस्त कर दिए । विवरणमें कहा गया है, “विदेशी धनमें लगभग ४० प्रतिशत न्यूनता आई है । विदेशी धनको अधिनियमित करनेवाले ‘एफसीआरए’के उल्लंघनपर शासनद्वारा ‘एनजीओ’पर की गई कार्यवाहीके कारण ऐसा हुआ ।”
कई संगठनोंने शासकीय कार्यवाहीका विरोध किया और इसे वैधानिक प्रक्रियाका दुरुपयोग बताया । मोदी शासनने गत वर्ष रिजर्व बैंकके समितिके सदस्य नचिकेत मोरका कार्यकाल अल्प कर दिया था । मोर भारतमें ‘बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन’के निदेशक हैं ।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघसे जुडे संगठन ‘स्वदेशी जागरण मंच’ने मोरको हटानेके लिए अभियान चलाया था । ‘फोर्ड फाउंडेशन और एमनेस्टी इंटरनेशनल’ जैसे बडे विदेशी ‘एनजीओ’को भी शासकीय कार्यवाहीका सामना करना पडा ।
यद्यपि, इस मध्य समाजसेवियोंका निजी योगदान बढा है । वित्त वर्ष २०१४-१५ में कुल निजी वित्त पोषण ६० सहस्र कोटि रुपये था, जो २०१७-१८ में बढकर ७० सहस्र कोटि रुपयेपर पहुंच गया !
भारतीय उद्योग जगतने इस अवधिमें ‘कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व’के (सीएसआर) अन्तर्गत १३ सहस्र कोटि रुपयोंका योगदान दिया, जो १२ प्रतिशत अधिक है । व्यक्तिगत दानकर्ताओंने ४३,००० कोटि रुपयेका योगदान दिया, जो २१ प्रतिशत अधिक रहा ।
“मोदी शासनने अवश्य ही विदेशी धनपर अत्यधिक नियन्त्रण किया है; परन्तु अभी भी अवैध कार्य करनेवाले गिरिजाघरों आदिको धन आ रहा है और न ही धर्मान्तरण पूर्ण रूपसे रूका है तो यह अवश्य ही विचारणीय है । वृक्ष बचानेके नामपर, तथाकथित अच्छे कार्योंके नामपर लिया जानेवाला धन ईसाई संस्थानोंको दिया जा रहा है, जिससे वे धर्मपरिवर्तनका कार्य करते हैं और कई मुस्लिम संस्थाएं आतंकी गतिविधियोंमें संलिप्त है, यह बार-बार उजागर हो ही चुका है; अतः इनपर पूर्ण प्रतिबन्ध आवश्यक है; क्योंकि एक स्रोत बन्द होते ही ये लोग धनके लिए दूसरा मार्ग खोज लेते हैं और अन्ततः उस धनसे केवल और केवल हिन्दुओं व राष्ट्रके विरुद्ध षडयन्त्र किया जाता है !” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : फर्स्टपोस्ट
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