नवरात्रके समय होनेवाली चूकोंको टालकर भावपूर्वक करें साधना (भाग-४)


आजकल अधिकांश लोग दुर्गा मांको जो चुनर चढाते हैं, वह कृत्रिम धागेकी अर्थात सिन्थेटिक वस्त्रकी होती है । इतना ही नहीं उसमें बहुत झालर और चिमकी इत्यादि लगी होती है और यह ऐसे विचित्र आकारकी होती है कि उसका कोई भी उपयोग नहीं होता है । एक तो वस्त्रकी सामग्री तामसिक और ऊपरसे उसकी कोई उपयोगिता भी नहीं होती है । माताको अर्पित चुनर या वस्त्रमें उनका तत्त्व समाहित हो जाता है; अतः उन्हें वस्त्र या चोली या चुनर अर्पण करते समय ध्यान रखें कि वह सूती या शुद्ध रेशमीका हो एवं उसपर सुईका कार्य कमसे कम किया हुआ हो । वस्त्र एक बार करघेसे निकल आए तो उसमें जितनी बार सुई डाली जाती है, उस वस्त्रकी सात्त्विकता उतनी ही घटती जाती है । इसलिए बिना सिली हुई सात्त्विक रंगकी साडी या चोलीका वस्त्र चढाएं एवं उसे देवी मांका प्रसाद मानकर उपयोगमें लाएं; क्योंकि वह उन्हें अर्पण करनेके पश्चात चैतन्यसे भारित हो जाती है ।
दुःखकी बात यह है कि आजकल मन्दिरोंमें भी देवी मांको ऐसे तामसिक वस्त्र पहनाए जाते हैं । वस्तुतः सूक्ष्म ज्ञान और सात्त्विकता किसे कहते ? इससे आज समाजका अधिकांश वर्ग अनजान है ।
अब आपको समझमें आया, इसीलिए हिन्दू राष्ट्र चाहिए; क्योंकि तब हम सभीको धर्मपालन कैसे करना है ?, यह सिखा सकेंगे ।



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