मौलवियों, एनजीओ, नेताओंकी मिलीभगतसे जम्मूमें बसाए गए रोहिंग्या,  जनसंख्या सन्तुलन परिवर्तनका षड्यन्त्र, मदरसों-मस्जिदोंमें आश्रय


०९ मार्च, २०२१
      ये ‘एनजीओ’ और ‘इस्लामी’ संस्थाएं रोहिंग्या मुसलमानोंको जम्मू पहुंचाती थीं और उनकी यात्रासे लेकर रहने और खाने-पीनेकी व्यवस्थाका पूरा उत्तरदायित्व उठती थीं । नेता भी उन्हें संरक्षण देते थे ।
म्यांमारकी न तो सीमा जम्मू कश्मीरसे लगी हुई है और न ही दोनों संस्कृतियोंके मध्य कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध है, उसके पश्चात भी प्रदेशमें रोहिंग्या मुसलमानोंकी संख्या इतनी कैसे हुई ? सहस्रोंकी संख्यामें रोहिंग्या मुसलमानोंका यहां पहुंचकर बस जाना किसी षड्यन्त्रका भाग प्रतीत होता है । वास्तवमें इससे पहले भी देशमें कट्टर जिहादियोंद्वारा ‘डेमोग्राफी बदलने’, अर्थात जनसंख्यामें दबदबा बढानेके षड्यन्त्रकी बात होती रही है ।
    ‘दैनिक जागरण’के एक विस्तृत समाचारके अनुसार, इस षड्यन्त्रमें राजनीतिक लोगोंके साथ-साथ कई ‘एनजीओ’ भी सम्मिलत हैं । सुरक्षा ‘एजेंसियों’की नाकके नीचे इतना सब कुछ किया गया । बांग्लादेशके मार्गसे रोहिंग्या मुसलमानोंका दल कोलकाता पहुंचता रहा है, जबकि अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंडकी सीमाएं सीधे म्यांमारसे लगती हैं । पता चला है कि उन्हें मालदासे लाकर वहांसे जम्मू भेजा जा रहा था ।
      ‘आईएसआई’ , ‘जमात-ए-इस्लामी’, कोलकताके मौलवी, जम्मू-कश्मीरके राजनीतिक दल, ‘एनजीओ’, मुसलमानी संस्थाएं, संयुक्त राष्ट्रसे सम्बन्ध संस्थाएं, जो शरणार्थियोंकी सहायताके नामपर देहलीके माध्यमसे कोलकतासे जम्मूतक सक्रिय रहकर इनको जम्मूतक पहुंचने और वहांपर ऐसे स्थानोंपर बसानेका कार्य करते आए हैं, जहां मुसलमान कम संख्यामें हैं ।
     यहांपर ध्यान देने योग्य बात यह है कि जो राजनीतिक दल अपने ही देशके नागरिकोंको वहां बसाने एवं ‘डेमोग्राफी’में परिवर्तनके नाम धरना प्रदर्शन करते आए हैं । वहीं यह दल ‘वोट बैंक’की राजनीति एवं मानवताके नामपर इन विदेश आतंकियों रोहिंग्याओंको जम्मूमें बसानेका समर्थन करते हैं, जो इनके दोहरे चरित्रको दिखलाता है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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