कुछ दिवस पूर्व मुझे एक लेख अकस्मात मिला, जिसमें लिखा था कि ‘जीन्स’को अधिक दिवसतक अच्छा रखना है तो उसे कमसे कम धोना चाहिए । तीन माहमें एक बार धोएं तो वह और अधिक दिन चलेगा ।
हमारे हिन्दू धर्ममें प्रत्येक दिवस स्नानके पश्चात धुले हुए वस्त्र पहननेका सात्त्विक विधान है ।
हमारे यहां निर्धनसे निर्धन ग्रामीण व्यक्ति, जिसे यदि वस्त्र धोने हेतु ‘साबुन’ न मिले तो वह उन्हें पानीसे खंगालकर पहनता है; किन्तु पिछले दिवसके उपयोगमें लाए वस्त्रोंको नहीं पहनता है ।
पहने हुए वस्त्रोंमें धूल, स्वेद (पसीना) एवं अन्य रोगको आमन्त्रित करनेवाले कीटाणु होते हैं; इसलिए नित्य धुले हुए वस्त्र पहनना, यह धर्माचरणका एक भाग है ।
आप साधुओंको, जो मात्र दो जोडी वस्त्रमें अपना निर्वाह करते हैं, उन्हें किसी भी नदी तटपर स्नानके पश्चात अपनी लंगोट और धोती सुखाते देख सकते हैं ।
आजके आधुनिक हिन्दुओंको इसलिए इतना अधिक शारीरिक और मानसिक कष्ट है; क्योंकि उनके सब कृत्य तमोगुणी होते हैं । बिना स्नान किए शरीरपर ‘डिओ’ लगाकर और केशमें ‘जैल’ लगाकर स्वयंको नायक समान समझते हैं । वस्तुतः मुझे तो ऐसे लोगोंसे एक सूक्ष्म दुर्गन्ध आती है, जो उनके अनिष्ट शक्तियोंसे आवेषित होनेके कारण आती है ।
Leave a Reply