बॉम्बे उच्च न्यायालयका निर्णय, पेंट’की ‘चेन’ खोल ५ वर्षीय बालिकाका हाथ पकडना यौन शोषणकी श्रेणीमें नहीं


३० जनवरी, २०२१
      मुंबई उच्च न्यायालयकी नागपुर पीठने अब यौन अपराधकी एक नवीन परिभाषा दी है । वक्षस्थल स्पर्शके निर्णयके पश्चात अब यौन शोषणके प्रकरणमें नवीन निर्णय सुनाते हुए न्यायालयने कहा है कि यदि कोई पुरुष अवयस्क बालिकाके समक्ष ‘पेंट’की ‘चेन’ खोल दे तो वह ‘पोक्सो’ विधेयकके अन्तर्गत अर्थात यौन शोषणकी श्रेणीमें नहीं आएगा । न्यायधीश पुष्पा गनेदीवालाकी एकल पीठने ५० वर्षीय एक व्यक्तिद्वारा ५ वर्षकी बालिकासे यौन शोषणके प्रकरण अन्तर्गत यह निर्णय दिया है । इससे पूर्व आरोपीको निचले न्यायालयने ‘पोक्सो’की धारा अन्तर्गत यौन शोषणके इस प्रकरणमें ५ वर्षका कारावास व २५ सहस्र (हजार) रुपयेका अर्थदण्ड दिया था । इस प्रकरणके अन्तर्गत बालिकाकी मांने परिवाद ( शिकायत) किया था कि आरोपीने उनकी पुत्रीके समक्ष अपने ‘पेंट’की ‘चेन’ खोली थी व बालिकाका हाथ अपने हाथमें लिया हुआ था । पीडिताकी मांने यह भी बताया कि वह उनकी पुत्रीको शयन हेतु शय्यापर आने हेतु भी कह रहा था । इस प्रकरणपर  न्यायालयमें सुनवाई करते हुए शारीरिक सम्पर्ककी नवीन व्याख्या दी गई है, जिसके अनुसार प्रत्यक्ष शारीरिक सम्पर्क ‘स्किन टू स्किन कांटेक्ट’को ही यौन शोषणकी श्रेणीमें रखा गया है । न्यायालयके अनुसार किसी बालिकाओंको उसकी इच्छाके विरुद्ध कामुकताके भावसे केवल  स्पर्श करना यौन शोषण नहीं माना जा सकता है । उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालयके इस विवादित निर्णयके पश्चात सर्वोच्च न्यायालयद्वारा इस निर्णयपर रोक लगाई गई है तथा मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडेकी अध्यक्षतावाली एक पीठने प्रकरणके आरोपीसे २ सप्ताहके भीतर उत्तर भी मांगा है ।

      भारतीय संस्कृति विश्वकी एकल आदर्श संस्कृति है । वहीं इस प्रकारके निर्णय क्या हमारे नैतिक मूल्योंका हनन नहीं है ? इस विषयपर सभी हिन्दू अवश्य विचार करें ! – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ

स्रोत : ऑप इंडिया



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