पाक कला (भाग-११)
स्त्रियां बिना स्नानके न बनाएं भोजन
आजकल स्त्रियां बिना स्नान किए रसोघरमें चली जाती हैं और अल्पाहार बनाना आरम्भ कर देती हैं | यदि आपसे पूछूं कि क्या आप मंदिर बिना स्नान किए जाएंगी तो आपका स्पष्ट उत्तर होगा नहीं अपवित्र देह लेकर हम वहां नहीं जा सकते हैं ! वैसे ही हमारा रसोईघर, अन्नपूर्णा मांका मंदिर होता है; इसलिए हिन्दू धर्ममें इस स्थानपर भी शुचिताका पालन किया जाता रहा है; किन्तु कालान्तरमें स्त्रियोंने इस कक्षमें महाप्रसाद बनानेकी अपेक्षा भोजन बनाना आरम्भ कर दिया और उसके लिए कोई शुचिताकी आवश्यकता तो होती नहीं है ! वस्तुत: स्त्रियोंने तो बिना स्नानके रसोईघरमें प्रवेश करना ही नहीं चाहिए, यह उन्होंने नियम ही बनाना चाहिए और यही संस्कार अपनी पुत्रियों या सेवकोंमें भी डालना चाहिए । आजकलकी अनेक स्त्रियों जो वैदिक संस्कृति अनुसार आचारधर्मका पालन नहीं करती हैं, मैंने उनकेद्वारा बनाए हुए भोजनपर सूक्ष्म काले आवरणकी मोटी परत देखी हैं, यह उनके देह और हाथसे विसर्जित होनेवाली सूक्ष्म काली शक्तिका ही परिणाम होता है, ऐसा भोजन करनेसे अनेक प्रकारके शारीरिक और मानसिक कष्ट होते हैं । अतः स्वादिष्ट भोजन बनान फिर भी सरल है; किन्तु सात्त्विक भोजन (प्रसाद) बनाना कठिन है; इसके लिए आवश्यक धर्माचरणका पालन करना अनिवार्य होता है ! किसी भी कलाको सीखने हेतु सत्त्व गुणी होना आवश्यक है अन्यथा वह कला कब आसुरी बन जाती है, यह ज्ञात ही नहीं होता है उसीप्रकार पाक शास्त्रमें भी हाथका कौशल्य होता है, क्योंकि तेल और मसाले तो सभी एक जैसे ही डालते हैं तो कुछ लोगोंके भोजनमें अद्वित्तीय स्वाद कैसे होता है, इसीको हाथका कौशल्य कहते हैं जिसका उल कारण यथार्थमें सूक्ष्म होता है ! एक सरलसा सिद्धांत ध्यानमें रखें, आप जितने सात्त्विक होंगे आपके बनाए भोजनका स्वाद उतना ही विलक्षण होगा और यदि आप उसे प्रसाद मानकर ही बना रहे हैं तो आपकी उस कृत्यसे आध्यात्मिक प्रगति भी होगी !
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