पाक कला (भाग-१२)


जैसा कि आपको बताया कि प्रतिदिन भोजन बनानेकी अपेक्षा महाप्रसाद बनानेका प्रयास करें, इससे इसे ग्रहण करनेवालेका मन परिष्कृत होगा या विवेक (सात्त्विक बुद्धि) भी जागृत होगा, घरमें रोग-शोक सब न्यून होंगे । पाक कलामें मात्र भोजन बनानेकी पद्धतिका महत्त्व नहीं होता है, हमारी वैदिक संस्कृतिमें हम सब कुछ ईश्वरको प्रसन्न करने हेतु करते हैं । आपके घर कभी यदि विवाह या उपनयनका संस्कार, गांवमें होता है तो आप ध्यानसे देखिएगा कि जो पारम्परिक हलवाई या रसोईया होता है, वह प्रथम चूल्हेकी या अंगीठीकी संक्षेपमें पंचोपचार पूजन करता है । आपने देखा है या नहीं मुझे ज्ञात नहीं; किन्तु मैंने तो अनेक बार देखा है; क्योंकि वह कर्म जो उसकी उपजीविका है, उसे वह साधना समझकर करता है ! वैसे ही गृहिणियों या जो भी सेवक या सेविकाएं भोजन पकाते हैं उन्होंने भोजन बनानेसे पूर्व यदि अन्नपूर्णा कक्षमें (रसोईघरमें) अन्नपूर्णाका विग्रह या मूर्ति हो तो उसका पूजन कर या उसे नमस्कार कर, तदोपरान्त प्रसाद(भोजन) बनाना आरम्भ करना चाहिए । यह करनेसे पूर्व स्नान करना चाहिए यह आपको कलके लेखमें बता ही चुकी हूं । इसके पश्चात प्रसाद बनानेकी प्रक्रियामें जितने भी उपकरण एवं सामग्री है, सबको मन ही मन नमस्कार करना चाहिए; क्योंकि ये सब हैं तो आप प्रसाद बना सकती हैं, यदि अग्नि न हो, तवा न हो, आटा न हो, जल न हो तो आप प्रसाद कैसे बनाएंगी ? जैसे पूजा पूर्व हम घंटी, शंख आदिकी पूजा करते हैं वैसे ही यह प्रसाद बनानेके क्रममें जो भी आवश्यक घटक हैं, उनके प्रति कृतज्ञताका भाव रख, उन्हें नमस्कार करना एवं सेवा पूर्ण होनेपर उन्हें कृतज्ञता व्यक्त करना, यह इस साधनारुपी कर्मका आवश्यक भाग होना चाहिए ! आप ऐसा करके देखें तो आपको आपके रसोईघरमें और आपके बनाएं प्रसाद रुपी भोजनमें दोनोंमें दिव्य परिवर्तनकी अनुभूति होगी ! यह सब हमारी भारतीय संस्कृतिका अंग थी, जो मैकालेकी आसुरी शिक्षण पद्धतिमें लुप्त हो गई और हमारे घरमें बिना संस्कारके अन्न खाकर हम रोग-शोकसे पीडित होने लगे हैं ।



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