पाक कला (भाग-२)


आजकल सम्पूर्ण भारतमें गेहूंके आटेकी रोटी बनानेका प्रचलन है । अनेक स्त्रियोंके हाथकी रोटियां यदि थोडी भी ठंडी हो जाएं तो वह कडी हो जाती हैं एवं खींचनेपर ही टूटती अर्थात वह मुलायम नहीं होती हैं; ऐसा मैंने पाया है; क्योंकि वे आटेको ठीकसे गूंदती नहीं हैं, हडबडीमें दो मिनिटमें आटा गूंदकर रोटी बना देती हैं, इससे रोटी ठीकसे फूलती भी नहीं है और मुलायम भी नहीं होती है । रोटी, जो मुख्य आहार है, यदि वह ठीकसे न बने तो समझ लें कि आपको भोजन बनाना नहीं आता है ! रोटी अच्छेसे फूले और मुलायम हो इस हेतु आटाको गूंदकर कमसे कम बीस मिनिट ढककर रखें और उसके पश्चात उसे पुनः दो मिनिट मिलाएं और रोटी बनाएं ! भोजन करनेवाला व्यक्तिने तृप्त होना चाहिए, इस हेतु उनसे पूछकर लें कि वे किसप्रकारकी रोटी खाना चाहेंगे, पतली या मोटी, हल्की सिंकी हुई या कडक सिंकी हुई, साथ ही सूखी लेंगे या घी लगी हुई, विशेषकर जब अतिथि आए तो इस बातका ध्यान अवश्य ही रखना चाहिए । एक कहावत है ‘आपरूप भोजन पररूप शृंगार’ अर्थात भोजन जिसे जो पंसद हो वैसा करना चाहिए या देना चाहिए और शृंगार जो दूसरोंके मनको भाए, ऐसा करना चाहिए, अर्थात जिससे अगला व्यक्ति जब उसे देखे तो मनमें उसे देखकर सात्त्विक विचार आये, ऐसा करना चाहिए !

 जब हम दूसरोंसे पूछकर भोजन बनाते हैं तो हमें दूसरोंका विचार करना चाहिए, साधकका यह गुण या संस्कार सुदृढ होता है ! हमारी भारतीय संस्कृतिमें हम भोजन कराते समय इसीलिए करबद्ध होकर पूछते हैं कि आपको भोजन कैसा लगा ? भोजन, यह जीवको क्षणिक सुख देनेका एक सुन्दर माध्यम है; इसलिए हमारे यहां भण्डारेका प्रचलन है जो एक धार्मिक कृति मानी जाती है; किन्तु यदि आपके भोजनसे कोई तृप्त ही न हो तो वह आपकी साधना कैसे हो सकती है ?; अतः उसे कराते समय योग्य दृष्टिकोण अवश्य ही रखना चाहिए !

  यदि गर्मीका दिन हो तो रोटीमें घी लगाकर थोडी देर पहले बनाकर रख सकते हैं, सर्दियोंमें घी पहलेसे लगाकर न रखें, इससे रोटी और सूख जाती है और खानेमें कठिनाई होती है !

   गर्मीके दिनोंमें रोटीको अधिक देर तक कैसरोलमें न रखें, इससे रोटीमें शीघ्र ही दुर्गन्ध आने लगती है । सर्दियोंमें रोटी गरम रहे इस हेतु उसे अवश्य ही कैसरोलमें रख सकते हैं (कैसरोल अर्थात वह पात्र जिसमें भोजन कुछ समयके लिए गर्म रहता है ।)

यह मैं क्यों बता रही हूं ?; क्योंकि आजकल स्त्रियोंमें लोगोंको या विशेषकर अतिथियोंको प्रेमसे तृप्तकर भोजन करानेका जो गुण है, वह धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है ! वे किसी प्रकार घरमें भी भोजन बनाकर खिला देती हैं और उन्हें लगता है कि उनका कार्य समाप्त हो गया; इसलिए ये अति सामान्य बातें बतानी पड रही हैं ।



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