पाक कला (भाग-३)


कुछ लोग रोटी बनाते समय उसमें नमक डालते हैं और उसी रोटीको दूधमें डालकर या उसमें भिगोकर खाते हैं ! आयुर्वेदके अनुसार, नमक और दूध विरुद्ध आहार है, इससे मण्डल कुष्ठ (दाद) एवं श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) जैसे चर्म रोग होनेकी सम्भावना होती है; अतः यदि आपके घरमें कोई दूधके साथ रोटी खाता हो तो रोटीका आटा गूंदते समय उसमें नमक न डालें ! वैसे ही कुछ लोग रोटीको मुलायम करने हेतु आटामें दूध डालकर गूंदते हैं, यह भी नहीं करना चाहिए ।  रोटीको यदि मुलायम करना हो तो उसे पहले अच्छेसे गूंदे और उसके पश्चात बीस मिनिट ढककर रखें या आटा गूंदते समय उसमें तेल या घीका मोयम डाल सकते हैं ।

कुछ लोगोंकी रोटियोंमें पलथनका प्रमाण बहुत अधिक होता है तो खानेकी थालीमें भी पलथनके रूपमें उपयोग किया हुआ सूखा आटा दिखाई देता है ! आटा यदि गीला गूंदा जाए तो पलथनका अधिक उपयोग करना पडता है; किन्तु रोटी सेंकनेके पश्चात उसे अच्छेसे चकलेपर ही झाडना चाहिए या अच्छे स्वच्छ एवं सूखे कपडेसे पोछना चाहिए ।

 रोटीको बनाकर कुछ लोग उसमें प्रथम रोटी भापसे गल न जाए; इसलिए सामान्य समाचारपत्रका प्रयोग करते हैं ! कुछ समय पश्चात उस रोटीमें उस समाचार पत्रकी स्याही लग जाती है जो एक अखाद्य रसायन होता है; इसलिए रोटी रखनेवाले पात्रमें या तो श्वेत कागद रखें या सबसे अच्छा है कि एक स्वच्छ वस्त्र रखें ! वैसे भी शास्त्र अनुसार वह रोटी गायकी होती है; अतः उसे खाना नहीं चाहिए; किन्तु यदि गाय या अन्य किसी पशुको आप नहीं दे रहे हैं और आप उसे खा रहे हैं तो वस्त्रमें रखना सर्वोत्तम है और उस वस्त्रको भी प्रतिदिन स्वच्छ जलसे धोना चाहिए ।  मैंने कुछ घरोंमें उस वस्त्रकी दुर्दशा देखी है, वह घी, तेल और पलथनसे चिकट हो जाता है; इसलिए ये सामान्य बातें भी बता रही हूं ।

   रोटीमें उपयोगमें लानेवाले चकला और बेलनको अन्य जूठे बर्तनोंके साथ नहीं रखना चाहिए ।  यदि उसमें आटा लगकर सूख गया हो उसे एक स्वच्छ पात्रमें जल भरकर पृथक रखना चाहिए और थोडी देरमें उन्हें धो देना चाहिए ।  यदि वह लकडी या पत्थरका हो तो उसे मात्र स्वच्छ जलसे धोना चाहिए, उसमें रासायनिक साबुन नहीं लगाना चाहिए; क्योंकि साबुनके कण उसके पोरोंमें चिपक जाते हैं और वे पुनः रोटीके माध्यमसे हमारे पेटमें जाते हैं जो अनेक प्रकारके चर्म एवं उदर रोगके कारण बनते हैं ।

   यदि घरमें किसीकी मृत्यु होती है तो लकडी और मिट्टीके सभी पात्र, जो उन तेरह दिनोंमें रसोई घरमें थे, जिसका उपयोग हम भोजन बनाने हेतु करते हैं, उन्हें पुनः उपयोगमें नहीं लेना चाहिए; क्योंकि उनपर उसकालमें  रज-तमका आवरण निर्माण होनेके कारण वे अशुद्ध हो जाते हैं और उनमें बना भोजन अशुद्ध माना जाता है; किन्तु यदि वे मिट्टी और लकडीके न हों तो उनका उपयोग किया जा सकता है ! पूर्वकालमें इसका पालन सभी गृहिणियां करती थीं, मैंने अपनी नानी और मांको भी ऐसा करते हुए देखा था; किन्तु आज अज्ञानतामें इनका पालन नहीं होता है !



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