पाक कला (भाग-७)
उत्तर भारतमें पराठेका प्रचलन बहुत अधिक है, यहां अनेक प्रकारके भरवा पराठेके साथ ही सादे पराठे भी बनाए जाते हैं । मैंने देखा है अनेक स्त्रियां त्रिकोण या चौकोर पराठे बनाती हैं, ऐसे आकारके पराठे तामसिक होते हैं; अतः पराठे सदैव गोल ही बनाने चाहिए ।
और एक तथ्य ध्यान रखें घीके पराठेसे अधिक पौष्टिक, घी लगी रोटियां होती हैं । घीको पराठेमें तवेपर पकानेके पश्चात पराठेके और घीके दोनोंके ही स्वास्थ्यवर्धक गुण कम हो जाते हैं ! जैसे आप घी लगी रोटियां खा लें और यदि आपको अम्लपित्तका कष्ट है तो वह कभी नहीं होगा; किन्तु घीमें बने पराठेमें ऐसा होनेकी सम्भावना हो सकती है । पराठे या पूरी स्वादके लिए अच्छे हैं और यह कभी-कभी खाया जा सकता है; किन्तु यदि आपको स्वास्थ्यवर्धक भोजन करना है तो घीको तवेपर रोटीके साथ जलने न दें अर्थात न पकाएं । देसी गायका घी एक बार तैयार हो जाए तो वह पित्तनाशक होती है इसलिए उसे भोजनमें पिघला कर या हलका गर्म कर लिया जा सकता; किन्तु उसे पुनः रोटीमें तेज आंचपर पकाया जाए या जलाया जाए तो पित्तवर्धक हो जाती है ।
बाटी, वाफला, लिट्टी जैसे पारम्परिक भोजनको भी आज अनेक लोग घीमें तल देते हैं जो कि स्वास्थ्यकी दृष्टिसे उतना पौष्टिक नहीं होता है और पचनेमें भी कठिन होता है ! ऐसे व्यंजनोंको अच्छेसे लकडी या कंडेकी आंचमें सेंककर उसपर घी लगाएं या घी पिघलाकर उसमें डुबो दें अर्थात पारम्परिक भोजन यदि कंडे और लकडीपर सेंकी जाए तो उसका स्वाद और पौष्टिकता दोनों ही वृद्धि होती है । यह मैं क्यों बता रही हूं; क्योंकि आजकल अनेक लोग आलसके कारण उसे माइक्रोवेव, विद्युतवाले बेकिंग चूल्हेपर या गैस चूल्हेपर सेंक देते हैं; किन्तु उसमें वह स्वाद नहीं होता जो पारम्परिक पद्धतिसे सिंकी इन व्यंजनोंमें होता है !
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