पाक कला (भाग-९)


आजकल प्रशीतक(फ्रिज) सभीके घरोंमें उपयोगमें लाए जाते हैं | मैंने देखा है कि अनेक लोग प्रशीतकमें रखे हुए भोजनको निकालकर उसे त्वरित गर्म करने हेतु चूल्हेपर रख देते हैं | ऐसे करनेसे खाद्य पदार्थोंमें जो अकस्मात तापमानका बहुत अधिक अंतर होता है उससे भोजनकी गुणवत्ता या उसकी पौष्टिकता पूर्णत: नष्ट हो जाती है | यदि आपको प्रशीतकमें रखे हुए भोज्य पदार्थ ग्रहण ही करने हों तो उसे कुछ देर तक सामान्य तापमानपर उसे आने दें, तत्पश्चात उसे गर्म करें | कुछ घरोंमें तो वे ‘डीप फ्रिजर’से हिम(बर्फ) बन चुके भोजन सामग्रीको (फ्रोजेन फूडको) निकालकर उसे माइक्रोवेवमें गर्म करने हेतु रख देते हैं जो कि अनुचित है | सर्वप्रथम तो भोजन सदैव जिस समय खाना हो उसी समय बनाए एवं उतना ही बनाएं जो बचे नहीं और यदि वह बच जाता है व शिशिर ऋतु (सर्दीका मौसम) हो एवं आप कुछ घंटोंमें उसे पुनः खानेवाले हैं तो उसे फ्रिजमें रखना टालें | ऐसे ऋतुमें भोजन बाहर ख़राब नहीं होता है | यदि ग्रीष्म ऋतु हो तो भी आप सब्जी इत्यादिको कुछ घंटे एक बडे पात्रमें ठंडा पानी रखकर, उसमें अपने व्यंजन रख सकते हैं, इसमें एक बातका ध्यान रखें जैसे कि आपको लगता हो कि आज तरकारी या दाल अधिक बन गई है तो उसे परोसनेसे पूर्व ही जितना आपको अधिक लगता हो उसे एक पात्रमें निकालकर रख दें | यदि हम तरकारी या दालमें बार-बार कलछुल या छलनी डालते हैं या उससे भोजन निकालने हेतु अनेक लोगोंका हाथ लगता हो तो ऐसे भोजन पदार्थ कुछ ही घंटोंमें खराब हो जाते हैं ! ध्यान रहे, फ्रिजमें भोजन रखनेके पश्चात उसकी गुणवत्ता या पौष्टिक तत्त्व ८० % नष्ट हो जाते हैं और यदि उसे आप रात्रिमें रख देते हैं तो वह बसी हो जाता है और बासी भोजन तामसिक होता है; अतः फ्रिजका उपयोग यथासम्भव कम करनेका प्रयास करें ! आनेवाले आपातकालमें बिजलीकी सुविधा भी बहुत ही कम मिलनेवाली है अतः अभीसे ये पूर्वसिद्धता करेंगे, तो आपको उस समय अधिक कष्ट नहीं होगा !
मैंने एक बात और देखी है कि सात्त्विक लोगोंके हाथके भोजन शीघ्र खराब नहीं होते हैं एवं जिन्हें अधिक आध्यत्मिक कष्ट हो या जो तामसिक प्रवृत्तिके हों उनके हाथके बने भोजन शीघ्र खराब हो जाते हैं | वैसे ही यदि वास्तुमें नकारात्मकता अधिक हो तो भी भोजन यदि दो घंटे भी बाहर रहे तो वह सड जाता है ! अतः सात्त्विक बने एवं अपने वास्तुको स्वच्छ और पवित्र रखें, इस हेतु क्या करना चाहिए यह तो आपको अनेक सत्संगों एवं लेखोंमें बारम्बार बता ही चुकी हूं |
   उसीप्रकार समय अभावके कारण आज अनेक लोग एक सप्ताहकी तरकारी एक ही दिवस लाकर प्रशीतकमें रखते हैं, यह भी अनुचित है | आपको ध्यानमें होगा आजसे २५ वर्ष पूर्व तक भी सभीके घरोंमें तरकारी प्रतिदिन लाया जाता था और उस समय आजकी अपेक्षा हम अधिक स्वस्थ रहते थे ! अतः यदि घरके किसी सदस्यको समय हो तो वे प्रतिदिन ताजी तरकारी लानेका प्रयास करें | यह मैं आपको क्यों बता रही हूं; क्योंकि धर्मप्रसारके मध्यम मैं अनेक वर्ष लोगोंके घरोंमें रही हूं और मैंने गृहिणियोंको बासी, सूखी एवं सडी-गली तरकारियोंमेंसे चुनकर उसे बनाते हुए देखा है | अनेक बार तो गृहिणियां आलस्यवश दो-तीन दिनकी तरकारी बनाकर एक साथ रख देती हैं और भोजन करते समय पूर्वके गूंदे हुए आटेसे रोटियां बनाकर खिला देती हैं | यदि आप भी ऐसा कर रहे हैं तो इस प्रवृत्तिको शीघ्र परिवर्तित करें, क्योंकि या वृत्ति आपके घरमें अनेक प्रकारके रोगोंको निकट भविष्यमें जन्म देगा | मेरे लिए सब कुछ जानते हुए ऐसा भोजन करना यह मेरी एकप्रकारसे साधना ही होती थी अमिने ऐसे अशुद्ध भोजनको तो अपने श्रीगुरुका नैवेद्य मानकर ग्रहण कर लेती थी और मेरे शुद्ध भावसे प्रार्थना करनेपर वह पवित्र भी हो जाता था किन्तु मैं अन्योंकी थालीमें तामसिक आवरणको स्पष्ट देख सकती थी; अतः आज ये तथ्य अपने अनुभवके आधारपर बता रही हूं !


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