जुलाई १०, २०१८
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदीने जब अपने संसदीय क्षेत्र काशीको ‘क्योटो’ बनानेकी बात कही तब काशीको जानने और समझने वालोंके मनमें यह प्रश्न बार-बार आया कि इतिहाससे भी पुरानी नगरी काशीको कोई ६०० वर्ष पुराने इतिहास वाले क्योटोके समान क्यों बनाना चाहता है ? क्या यह घोषणा सोच समझकरकी गई या इसके पीछे केवल ‘काशी और क्योटो’की शाब्दिक वक्तव्य भर था ?
काशीको क्योटो बनानेके इसी क्रममें काशी विश्वनाथ मन्दिरके विस्तारीकरणके लिए बनारसके ‘ललिता घाट’से विश्वनाथ मन्दिरतक दो सौ से अधिक भवन चिन्हित किए गए हैं, जिन्हें तोडा जा रहा है । इनमें लगभग ५० की संख्यामें प्राचीन मन्दिर व मठ सम्मिलित हैं । ये सभी ‘काशी विश्वनाथ कॉरिडोर’की सीमामें आने वाले मन्दिर हैं ।
इन प्राचीन मन्दिरों, देव विग्रहोंकी रक्षाके लिए आन्दोलनरत शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्दके शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द १२ दिवसके उपवासपर बैठे हैं । स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्दका कहना है कि काशीका ‘पक्का महाल’ ऐसे वास्तु विधानसे बना है, जिसे स्वयं भगवान शिवने मूर्तरूप दिया था । ऐसे में ‘काशी विश्वनाथ कॉरिडोर’के कारण ‘पक्का महाल’के पौराणिक मन्दिरों और देव विग्रहोंको नष्ट करनेसे काशी ही नष्ट हो जाएगी !
स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्दका कहना है कि ‘पक्का महाल’ ही काशीका मन, मस्तिष्क और हृदय है । पक्का महाल ऐसे वास्तु विधान से बना है जिसे स्वयं भगवान शिवने मूर्तरूप दिया था । ऐसे में इसके नष्ट होनेसे काशीके नष्ट होनेका संकट है । यह केवल काशीके एक भाग ‘पक्का महाल’ अथवा यहां रहने वालोंकी बात नहीं है, बल्कि सवा सौ कोटि देशवासियोंकी आस्थाका प्रश्न है । देशके भिन्न-भिन्न भागोंसे पुराणों/ग्रन्थोंमें पढकर लोग अपने आराध्य देवी-देवताओंके दर्शन करने काशी आते हैं । ऐसे में जब वे काशी आएंगे, तब अवश्य पूछेंगे कि उनके देवी देवता कहां गए ?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द आगे कहते हैं कि यह विषय रामजन्म भूमिसे भी वृहद है; क्योंकि अयोध्यामें केवल एक मन्दिरकी बात है; लेकिन यहां हमारे पुराणोंके उपरोक्त परम्परासे पूजित अनेक मन्दिरोंकी बात है । अभी हम शास्त्रोंके अनुसार ही विरोध कर रहे हैं; लेकिन यदि शासन राजनीतिसे प्रेरित होकर यह अपेक्षा करेगी कि वह जनदबावसे ही मानेगी, तब हम जनताका आह्वान भी करेंगे ! ऐसे में यह प्रश्न अवश्य उठेगा कि जो दल मन्दिर बनानेके नामपर सत्तामें आया था, उसने मन्दिरोंको क्यों तोडा ?
स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्दका कहना है कि हम शासनकी किसी योजनाके विरोधमें नहीं हैं । शासन जनताके हितमें ही कोई योजनाएं लाती हैं । हमारा विरोध केवल इतना है कि किसी भी विग्रह और मन्दिरोंको अपमानित ना किया जाए, अपूजित ना रखा जाए, उनके स्थानसे उन्हें न हटाया जाए ! इतना सुरक्षित रखते हुए यदि ‘कॉरिडोर’का निर्माण हो तो हमें कोई आपत्ति नहीं ।
‘पक्का महाल’की अवधारणा काशीके गंगा तटपर अस्सी से राजघाटतक की है । कहा जाता है कि काशीको समझना हो तो ‘पक्का महाल’को समझना आवश्यक है । यह क्षेत्र कई संस्कृतियोंको समेटे हुए है । देशका ऐसा कोई राज्य नहीं, जिसका प्रतिनिधित्व ‘पक्का महाल’ न करता हो । भिन्न-भिन्न राज्योंके प्राचीन भवन व वहां पूजे जाने वाले पौराणिक मन्दिर और देव विग्रह इसी क्षेत्रमें स्थित हैं । जिनके दर्शन करने समूचे देशसे लोग आते हैं । ‘पक्का महाल’में बंगाली, नेपाली, गुजराती, दक्षिण भारतीय समुदायोंके अपने-अपने उपक्षेत्र हैं ।
काशीमें विकासके बहुतसे कार्य हुए हैं; लेकिन पौराणिक महत्व रखने वाले धरोहरोंको कभी नष्ट नहीं किया गया, न ही इन्हे छेडा गया; लेकिन आज काशीका यही ‘पक्का महाल’ विकासकी भेण्ट चढने जा रहा है । सहस्त्रों वर्ष प्राचीन धरोहरको मिटानेके षडयन्त्रको विकासका चोला पहना दिया गया है, जिससे काशीका हृदय कहे जाने वाला ‘पक्का महाल’ इन दिनों भयभीत सा है; क्योंकि इसके अस्तित्वपर संकट खडा हो गया है !
स्रोत : आजतक
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