पञ्च महायज्ञ कैसे करें ?


स्वाध्याये नार्चयेतर्षीन्हो मैर्देवान्यथाविधि । पितृ श्राद्धैश्च नृनन्नैर्भूतानि बलिकर्मणा ।। – मनुस्मृति

अर्थ : स्वाध्याय तथा पूजासे  ऋषियोंका सत्कार, शास्त्र अनुसार यज्ञ कर देवताओंकी पूजा, श्राद्धसे पितरोंकी पूजा, अन्न देकर अतिथियोंकी  और बलिकर्मसे सम्पूर्ण भूतोंकी पूजा (संतुष्टि) करनी चाहिए ।

भावार्थ : गृहस्थ जीवन अर्थात कौटुम्बिक जीवन सुखी रहे, इस हेतु हमारे धर्मशास्त्रोंमें पञ्च महायज्ञकी पद्धति बताई गयी है ! यह पञ्च धार्मिक क्रिया, जो  देव, ऋषि, पितर, भूत (जड एवं चेतन) और अतिथिको कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु पञ्चयज्ञ कर्म है, जिनके बिना गृहस्थ जीवन सुखी नहीं हो सकता है ।

वर्तमान कालमें गृहस्थ जीवनमें अनेक कष्ट होनेके पीछे मूल कारण यही हैं । आजका गृहस्थ भोगवादी एवं कृतघ्न हो गया है । मैकालेकी शिक्षण पद्धतिसे उपजे जन्म हिन्दू निमित्त मात्र हिन्दू रह गए है, उसके लिए मात्र स्वार्थ सिद्धि एवं भोग लिप्साका महत्व रह गया है; परिणामस्वरूप उसकी अगली पीढी, धर्मसे विमुख समाज और पितर तीनोंने मिलकर उसका जीवन नरक बना दिया है । सन्तोंका तिरस्कार करना, जीवित माता –पिता एवं अग्रजकी अवमानना करना, उनके प्रति कृतघ्नताका भाव रखना, मृत पितरोंके सूक्ष्म अस्तित्वको नहीं मानना, अतिथिके आनेपर भृकुटी तन जाना और जड एवं चेतन जगतके  प्रति अपने उत्तरदायितत्वको न माननेके कारण आज गृहस्थ आश्रम टूटनेकी सीमा रेखापर पहुंच चुका है।

* कलिकालमें खरे सन्तोंके प्रति सम्मानकी भावना रखना, वैदिक संस्कृतिका प्रसार करना, उस कार्यमें यथाशक्ति योगदान देना, धर्मकार्य करनेवालोंका सम्मान करना, ऋषियोंद्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त एवं शास्त्रोंका अध्ययन एवं अध्यापन करना, धर्माचरण करते हुए समाजके समक्ष आदर्श रख वैदिक परंपराका संरक्षण करना, इससे ऋषि ऋण चुकता करना कहते हैं।

* देवताका नामजप करना एवं करवाना, देवालयोंकी (मंदिरोंकी) रक्षा करना, उनका धर्मशिक्षण स्थलके रूपमें पोषण करना, देवताओंकी विडम्बना रोकना, देवताके सगुण स्वरूपके प्रति निष्ठा रख उनका पञ्चोपचार या षोडशोपचार पूजन या यज्ञ कर, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना इत्यादिसे देव ऋण चुकाया जा सकता है ।

* जीवित पितरके प्रति आदर भाव रख, उनकी सेवा करना एवं मृत्यु उपरान्त उनकी श्राद्ध इत्यादि धार्मिक विधि शास्त्रोक्त पद्धति अनुसार करते हुए नियमित दो घण्टे ‘श्रीगुरुदेव दत्त’का जप करना, इन सबसे पितृ ऋण चुकता होता है ।

* अतिथिका यथोचित एवं यथाशक्ति निष्काम भावसे प्रेमपूर्वक सेवा करना, इससे अतिथि ऋण चुकता होता है ।

* पञ्च महाभूत एवं प्राणी जगतका विचार कर उनका पोषण करना, समाजके लोग साधना एवं धर्माचरण करें इस हेतु साधनाका महत्व समाजके मनपर प्रतिबिम्बित करने हेतु यथाशक्ति योगदान देनेसे भूत ऋण चुकाया जा सकता है । – तनुजा ठाकुर



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