मस्जिदोंसे घोषणा होती थी, किसकी कब हत्या की जाएगी, उनकी इच्छा थी ‘निजाम-ए-मुस्तफा’: पत्रकारने बताई कश्मीरी पण्डितोंके साथ घटित क्रूरतम घटनाएं 


२१ जनवरी, २०२१
      ‘आईएएनएस’ समाचार ‘एजेंसी’की सम्पादक आरती टिंकू सिंहने १९९० के समय कश्मीरी पण्डितोंपर हुए अत्याचारोंकी घटनाएं ‘यू ट्यूब चैनेल’ ‘डिफेंसिव ऑफेंस’पर साझा की हैं ।
         उनके अनुसार, वे १२ वर्षकी थीं, तभी १९८६ से यह संघर्ष प्रारम्भ हो गया था । जब १९८७ में ‘नेशनल कॉन्फ्रेस’, कांग्रेसके साथ गठबन्धनसे चुनावमें विजयी हुई; उन दिनों उनके घर एक मुसलमान लडका चाकरी करता था । वह नित्य बताता था कि कब कहां बम विस्फोट होगा या कब किसकी हत्या होगी ? उससे पूछनेपर ज्ञात हुआ कि यह घोषणाएं मस्जिदोंसे नित्य की जाती थीं । अनंतनागमें उनके व्यापार स्थानपर भी २ बार आक्रमण हुआ । जब घरके पुरुष चोटिल होकर घर लौटे थे । उनके व्यापार स्थानोंको दहन किया गया था । मस्जिदोंसे घोषणा होती थी कि हिन्दू महिलाओंको यही रखकर हिन्दू पुरुषोंका संहार किया जाए । घरके पुरुषोंने कहा था कि आतङ्की घरोंतक पहुंचनेमें सफल होते हैं, तो महिलाओंको आत्महत्या करनी है । किसी प्रकार उनका परिवार ट्रकमें छुपकर गोलाबारी और पथरावके मध्यसे निकलकर जम्मू पहुंचा । ‘टेण्ट’में रहवास हेतु स्थान पानेके लिए अनेक सप्ताह कतारमें खडे होना पडा । शासन, उनकी सहायता करने आगे नहीं आया । पत्रकार भी सत्य नहीं लिखते थे । शेख अब्दुल्लाके शासनमें आनेके उपरान्त, अत्याचारोंका सत्य न लिख, वे पण्डितोंको धनवान तथा उच्च जातीय और अत्याचारी बताते थे । आरती टीकू सिंह इन घटनाओंका मूल कारण १९३० की राजनीति बताती है, जब जिन्नाने कहा था कि हिन्दू-मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते । भारतीय स्तम्भकार सुनन्दा वसिष्ठने भी ‘यू एस कांग्रेस’की बैठकमें बताया था कि एक ही रात्रिमें लगभग ४ लाख कश्मीरी हिन्दू भयभीत होकर अपनी धन, सम्पत्ति यथावत छोडकर कश्मीर घाटीसे पलायन करनेको विवश हुए थे ।
        कश्मीरी पण्डितोंकी नृशंस हत्याओंकी घटनाएं ज्ञात होते ही केन्द्र शासन त्वरित सेना भेजती तो उनकी रक्षा की जा सकती थी । उन्हें अपनी धन सम्पत्ति त्यागकर पलायन नहीं करना पडता । अब मोदी शासन उन्हें पुनः कश्मीरमें बसानेको प्रयासरत है । आशा है कि वे पुनः अपने जन्म स्थानोंमें जाकर शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकेंगे । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ 

स्रोत : ऑप इंडिया



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