पारिवारिक तथा सामाजिक जीवनके लिए घातक है ‘स्मार्ट फोन’


अत्याधुनिक तकनीकसे युक्त चलभाष उपकरण अर्थात ‘स्मार्टफोन’ हमारे जीवनका अभिन्न अंग बनता जा रहा है । प्रायः यह देखनेमें आता है कि कई लोगोंका तो पूरा दिन चलभाषके सहारे ही व्यतीत होता है । ‘स्मार्टफोन’ आधुनिक युगकी एक आवश्यकता है; किन्तु यह आवश्यकता अब द्रुत गतिसे रोगमें परिवर्तित हो रही है । ‘स्मार्टफोन’का बहुत अधिक उपयोग, अन्य उपयोगी वस्तुओंके दुरुपयोग और व्यसनके समान है । जो लोग इसका अधिक उपयोग करते हैं, वे स्वयं को, समाजसे अत्यधिक कटा हुआ आभासित करते हैं । ऐसे लोग एकाकीपन, उदासी और चिन्ताओंसे ग्रसित होते हैं । इतना ही नहीं आजकल ‘स्मार्टफोन’ परिवारोंमें कलहका कारण भी बन रहा है ।एक अध्ययनमें इस बातका रहस्य खुला है । अध्ययनके अनुसार, जो लोग ‘स्मार्टफोन’का अधिक उपयोग करते हैं, वे इसकी गतिविधियोंके मध्य चलभाषमें खो जाते हैं और अपना ध्यान केन्द्रित नहीं रख पाते । इस उपकरणके सही उपयोगके बारेमें जागरुकता उत्पन्न करनेकी आवश्यकता है कि इस प्रकारका व्यसन हमें मानसिक रूपसे थका देता है और विश्राम नहीं करने देता ।शोधकर्ताओं तथा मनोवैज्ञानिकोंके अनुसार “हमारे चलभाष और संगणकपर (कम्प्यूटरपर) आनेवाले सूचना-संकेतों (नोटिफिकेशन), कम्पन और अन्य संकेत हमें निरन्तर’ इसके पटल अर्थात ‘स्क्रीन’की ओर देखनेके लिए विवश करते हैं । शोधके अनुसार यह सतर्कता कुछ वैसी ही प्रतिक्रियाका परिणाम है जैसा कि किसी संकटके समय या आक्रमणके समय प्रतीत होती है ।”मनोवैज्ञानिकोंने अपने निष्कर्षमें कहा है कि इसका अर्थ यह है कि हमारा मस्तिष्क सतत सक्रिय और सतर्क रहता है, जो कि इसकी स्वस्थ कार्य प्रणालीके अनुरूप नहीं है । हम सतत उस गतिविधिकी खोज करते हैं और उसकी अनुपस्थितिमें व्याकुल, उत्तेजित और एकाकीपनका आभास होता है । यदि हमें ३० मिनिटतक कोई ‘कॉल’ प्राप्त न हो तो चिन्ता होने लगती है । प्रायः ३० प्रतिशत चलभाष उपयोगकर्ताओंमें यह समस्या होती है । काल्पनिक ध्वनिका आभास होना या ‘फैंटम रिंगिंग’ २० से ३० प्रतिशत चलभाष उपयोगकर्ताओंमें विद्यमान होती है । उन्हें ऐसा आभास होता है कि उनका चलभाष बज रहा है और वे बार-बार उसे जांचते हैं; परन्तु यह मात्र कल्पना होती है, सत्य नहीं ।”अध्ययनमें कहा गया है कि ३० प्रतिशत प्रकरणोंमें ‘स्मार्टफोन’ माता-पिताके मध्य कलहका कारण भी बनता है । चलभाष अधिक उपयोग करनेवाले बच्चे सामान्यतः देरसे जागते हैं और विद्यालय जानेके लिए सिद्ध (तैयार) नहीं होते हैं । लोग सोनेसे पहले स्मार्ट फोनके साथ बिस्तरमें ३० से ६० मिनिट बिताते हैं ।‘गैजेट्स’के माध्यमसे जानकारी प्राप्त करनेके कारण मस्तिष्कके ‘ग्रे मैटर’में न्यूनता (कमी) आती है, जो कि संज्ञान और भावनात्मक नियन्त्रणके लिए उत्तरदायी होता है । इस ‘डिजिटल’ युगमें, अच्छे स्वास्थ्यकी कुंजी है संयम । हममेंसे अधिकांश लोग ऐसे उपकरणोंके दास बन गए हैं, जो वस्तुतः हमें स्वतन्त्रता प्रदान करनेके लिए थे तथा हमें जीवनका अनुभव प्रदान करने और लोगोंके साथ रहने हेतु अधिक समय देनेके लिए बनाए गए थे; परन्तु हुआ इसके विपरीत और हम न स्वयं इनके दास बन गए; अपितु अपने बच्चोंको भी उसी मार्गपर ले जा रहे हैं ।”यह ‘स्मार्टफोन’के अत्यधिक उपयोगका व्यसन, मात्र परिवारोंमें ही कलहका कारण नहीं बन रहा है; अपितु ‘सोशल मीडिया’का अत्यधिक उपयोग भी प्राणघातक प्रमाणित हो रहा है । किशोर और युवा वयके लडके-लडकियोंमें इसके उपयोगका अभ्यास, व्यसनमें परिवर्तित होते जा रहा है । किशोर और युवा उम्रके लडके-लडकियां अपना अधिक समय इसपर व्यतीत कर रहे हैं । वे एक आभासी संसारमें जी रहे हैं जो उनके वास्तविक संसारसे पूर्णतः भिन्न है । ‘सोशल मीडिया’पर उन्होंने अनेकानेक अपरिचितोंको अपना मित्र बनाया है और उनका यह कृत्य एक दुःस्वप्नमें परिवर्तित हो रहा है । अगणित युवाओं और किशोरोंको इस व्यसनसे मुक्ति पानेके लिए व्यसन मुक्ति केन्द्रोंमें (डी एडिक्शन सेंटरमें) प्रविष्ट (भर्ती) होना पड रहा है । देशके पृथक-पृथक भागोंसे ‘सोशल मीडिया’में सक्रिय युवाओंकी कई प्रकारके अपराध और आत्महत्याओंके समाचार आ रहे हैं । अन्तर्जालपर (वाइड वेबपर) विकसित इस आभासी संसारके तकनीकी, मनोवैज्ञानिक और चिकित्सकीय पक्षोंके सम्बन्धमें बतानेसे पूर्व आपको कुछ ऐसे प्रकरणोंकी जानकारी देना आवश्यक है । महाराष्ट्रके परभणीमें ऐश्वर्या नामकी एक लडकीको उसके माता-पिताने ‘सोशल मीडिया’के अधिक उपयोगसे टोका और ऐसा करनेसे मना किया तो उसने अपने माता-पितासे लडाई की और सीधे अपने कक्षमें गई और फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली । उसने अपने अन्तिम वक्तव्यमें लिखा कि ‘सोशल मीडिया’का उपयोग कोई अपराध नहीं है; परन्तु मेरे माता-पिताको लग रहा है कि यह अपराध है और वे मुझे इसके उपयोगसे रोक रहे हैं; अतः मैं आत्महत्या कर रही हूं !एक अन्य उदाहरण नोएडाके कुणालका है जो १० वींमें बहुत अंक लाया तो उसके माता-पिताने उसे एक ‘स्मार्टफोन’ उपहारमें दिया । उसकी पढाई-लिखाई बहुत कम हो गई और उसका अधिक समय फोनपर बीतने लगा । परिवारके सदस्योंके साथ भी उसका मेल-मिलाप अल्प हो गया । वह अपने खाने-पीने और दूसरे व्ययके लिए मिलने वाले पैसेका उपयोग ‘इण्टरनेट पैकेज रिचार्ज’ करनेके लिए करता था । जब उसे इससे रोका जाने लगा तो वह आक्रामक हो गया । हर बार जब उसको टोका जाता तो वह आक्रामक होकर चिल्लाता था और वस्तुएं इधर-उधर फेंकने लगता था । अन्ततः उसके १२ वीं कक्षाके परिणाम सम्यक नहीं आए और तब उसे व्यसन मुक्ति केन्द्रमें प्रविष्ट कराना पडा । देशके विभिन्न नगरोंके ऐसे अनेकानेक उदाहरण हैं, जिनका सार-संक्षेप यह है कि बच्चोंको ‘स्मार्टफोन’ और ‘इण्टरनेट कनेक्शन’ देनेका अत्यधिक मूल्य परिवारोंको चुकाना पड रहा है ।मनोवैज्ञानिकोंने इससे बचाव हेतु ‘इलेक्ट्रॉनिक कर्फ्यू’का सुझाव देते हुए कहा, “इलेक्ट्रॉनिक कर्फ्यूका तात्पर्य है सोनेसे ३० मिनिट पहले किसी भी ‘इलेक्ट्रॉनिक’ उपकरणका उपयोग न करना । प्रत्येक तीन माहमें सात दिनोंके लिए ‘फेसबुक’से अवकाश लें ! सप्ताहमें एक बार पूरे दिन ‘सोशल मीडिया’के उपयोगसे बचें ! चलभाषका उपयोग केवल आवश्यक चर्चा करनेके लिए करें ! दिनमें तीन घण्टेसे अधिक समयतक कम्प्यूटरका उपयोग न करें !”उन्होंने कहा, “अपने चलभाषपर वार्तालापके समय अर्थात ‘टॉकटाइम’को दिनमें दो घण्टेसे अधिक समयतक सीमित करें ! दिनमें एकसे अधिक बार अपनी चलभाष ‘बैटरी रिचार्ज’ न करें !” ऐसे कुछ उपाय चलभाषके व्यसनसे मुक्ति दिलानेमें सहायक हो सकते हैं; किन्तु संयम और विवेकाधीन उपयोग इस व्यसनसे बचनेका सर्वश्रेष्ठ उपचार है ।



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