एक साधकने पूछा है कि पवित्र रहनेसे आध्यात्मिक प्रगति कैसे होगी ? 


   कलियुगमें सामान्य साधकोंका प्रवास तमसे रज एवं रजसे सत्त्व गुणकी ओर होता है । पवित्र रहनेसे हमारी सात्त्विकता शीघ्र बढती है, मन शान्त रहनेसे साधना अच्छेसे होती है, बुद्धि सात्त्विक होनेसे विवेकमें परिवर्तित हो जाती है, इससे उचित अनुचितका भेद करना सरल हो जाता है ।
ध्यान रहे ! हिन्दू धर्म मात्र एक जीवनशैली है और वह सात्त्विक जीवनशैली है । जब कोई साधक सात्त्विक रहता है तो ही वह त्रिगुणातीतकी ओर बढ सकता है, जो हमारा मूल लक्ष्य होता है; इसलिए सात्त्विक रहने हेतु पवित्र रहना आवश्यक होता है या ऐसे कह सकते हैं कि ये दोनों एक दूसरेके पूरक हैं ।


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