आपके लेखोंको पढनेके पश्चात एवं यूट्यूबपर आपके सत्संग सुननेके पश्चात मैं थोडा सम्भ्रममें हूं ! यदि हमारे गुरु वैकुण्ठवासी हो गए हों तो भी क्या उनका छायाचित्र हम अपने पूजाघरमें नहीं रख सकते हैं ? मेरे गुरुके विषयमें एक बात और बता दूं कि हमारे आश्रममें उनका किसी गुरुबन्धुसे विवाद चल रहा था और इसी क्रममें उनकी कुछ वर्षों पूर्व हत्या हो गई, ऐसेमें हमें क्या अपने गुरुका छायाचित्र रखना चाहिए या नहीं ? हमने उसे अपने पूजाघरमें रखा है और मुझे लगता है कि उन्हें गति नहीं मिली है और कृपया बताएं कि अब उनके छायाचित्रका मैं क्या करूं ? - नरेश मित्तल, फ्रैंकफर्ट, जर्मनी


सर्वप्रथम यह जान लें कि हमें पूर्वजोंके छायाचित्र पूजाघरमें तो कदापि नहीं रखना चाहिए और रही बात गुरुकी तो अध्यात्मशास्त्र कहता है कि गुरु चाहे देहमें हों या न हों उनके छायाचित्र हम अपने पूजाघरमें या अपनी दृष्टिसे समक्ष कहीं भी रख सकते हैं । जहांसे उन्हें देखनेपर हमारी भाव जाग्रति होती हो या साधना करनेकी प्रेरणा मिलती हो ! ऐसा इसलिए; क्योंकि गुरुका आध्यात्मिक स्तर ७०% से अधिक होता है और उनका अहं बहुत ही न्यून होनेके कारण वे जीवनमुक्त होते हैं; इसलिए उनके देहमें रहनेपर भी हम उनके छायाचित्र या विग्रहको माला पहना सकते हैं या पूजाघरमें भी रख सकते हैं ।
  आपके गुरुकी हत्या हुई थी और आपको लगता है कि उन्हें गति नहीं मिली है तो इस सम्बन्धमें आप किसी सन्तसे पूछें ! आज सामान्यतः किसी भी भगवाधारी मठाधीश, योगाचार्य, कथावाचक या अध्यात्मविद या विद्वान व्यक्तिको लोग सन्त समझते हैं; किन्तु ऐसे सभी लोग सन्त नहीं होते हैं । कुछ लोग तो संस्कृतके प्राचार्यको भी अपना गुरु मान लेते हैं और उनकी पूजा आरम्भकर देते हैं, ऐसे ही एक प्राचार्यसे मेरी भेंट हुई, बाह्य वेशभूषा तो पूर्णतः सन्तों जैसी ही थी । श्वेत लम्बे केश और दाढी, सिरपर तिलक, गलेमें माला और वस्त्र भी पारम्परिक पहनते थे । मेरी उनसे भेंट एक तीर्थनगरीके किसी धार्मिक कार्यक्रममें हुई थी । संस्कृतके विद्वान थे एवं अपने क्षेत्रमें एक कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मणके रूपमें प्रसिद्ध थे । वे भागवातादि कथा भी करते थे और दो-चार बार हम उनसे किसी न किसी कार्यक्रममें मिले । बाह्य वेशभूषासे वे सौ प्रतिशत सन्त लगते थे । वृत्तिसे भी सात्त्विक थे; किन्तु उनसे वार्तालाप करनेपर उनके तीव्र अहंका भान हुआ और सूक्ष्म सम्बन्धी उनका ज्ञान शून्य था । हां, संस्कृतके विद्वान थे तो स्वाभाविक भी शास्त्रका भी उन्हें ज्ञान था; किन्तु वह शब्दजन्य ही था । उनसे शीघ्र आत्मीयता हो गई और मैं उनके घर गई तो उनके घरकी स्थिति देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गई ! उनके घरमें तीव्र पितृदोष एवं तीसरे पातालके मान्त्रिकका कष्ट था, जिससे घरके सभी लोग किसी न किसी रूपमें पीडित थे एवं घरका वास्तु बहुत ही नकारात्मक था जबकि घरमें सभी थोडी-थोडी अपने मनानुसार साधना भी करते थे । बात ही बातमें मैंने उन्हें इस ओर संकेत भी किया; किन्तु अहंके वश वे कुछ भी सुननेको इच्छुक नहीं थे । उनके कोई गुरु तो थे और वे भी उनके समान विद्वान थे; किन्तु सन्त नहीं थे और अब देहमें भी नहीं हैं । उनसे कुछ समय सम्पर्कमें रहनेपर, उनकी बातों एवं बाह्य वेशभूषामें इतना अन्तर देखकर मुझे उनका आध्यात्मिक स्तर जाननेकी जिज्ञासा हुई तो सूक्ष्मसे ज्ञात हुआ कि वह मात्र ४५% ही था । यह प्रसंग मैं आपको इसलिए बता रही हूं; क्योंकि इससे आपको यह ज्ञात हो कि बाह्य वेशभूषासे किसीके सन्त होने या न होनेका ज्ञान नहीं हो सकता है । अति विनम्रतापूर्वक आपको बता दूं कि वर्तमान कालमें ९८% गुरुपदपर आसीन व्यक्ति या गुरु सदृश दिखाई देनेवाला व्यक्ति गुरु नहीं होता है; इसलिए यदि आपको ऐसा लगता है कि आपके गुरुको गति नहीं है तो आप उनके छायाचित्रको त्वरित अपने पूजा घरसे हटा दें; क्योंकि ऐसे ही एक गुरुके विषयमें एक साधकने मुझे पूछा था और उनके यहां अभी भी उनकी गादीका विवाद चल रहा है, उन मठाधीशको मृत्यु उपरान्त गति नहीं मिली थी और उनके आश्रममें जानेपर मुझे ज्ञात हुआ कि ब्रह्मराक्षस योनिको प्राप्त हुए हैं; इसलिए जब आप किसी सन्तसे पूछ लेंगे और यदि वे बता दें कि उन्हें गति नहीं मिली है तो आप उनके छायाचित्रको विसर्जित करें ! यदि जर्मनीमें आप उसे जलमें विसर्जित नहीं कर सकते हैं तो कर्पूरसे उस छायाचित्रको अग्नि समाधि अवश्य ही दे सकते हैं । साथ ही भारत आनेपर उनके निमित्त श्राद्धविधि कराएं और अध्यात्मशास्त्र अनुसार साधना करें, इससे आपको गुरुतत्त्व या ईश्वरीयतत्त्वसे शीघ्र योग्य मार्गदर्शन प्राप्त होगा ।


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