जिस आराध्य देवताका हम मन्त्र या नाम जपते हैं, उनकी विशेषताओं, कार्य एवं लीलाओंका भी अभ्यास करना चाहिए, इससे आराध्यके प्रति प्रेम और आदर भाव निर्माण होता है, इससे श्रद्धामें वृद्धि होती है, यही श्रद्धा कालान्तरमें भावमें परिवर्तित होती है ।
आराध्यके प्रति प्रेम और भावसे नामजप भी भावपूर्ण होता है । जैसे जब पुत्र मांकी दृष्टिसे बहुत दूर होता है तो मां उसके बाल्यकालकी स्मृतियोंको स्मरणकर, अपने पुत्रके प्रति प्रेमको जागृत रखती है । वैसे ही ईश्वरने जो भी दिया है उसका कृतज्ञतापूर्वक स्मरणकर, ईश्वरके प्रति कृतज्ञ रहनेसे भाव वृद्धि होती है ।
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