प्रतिदिन स्नान क्यों करें ?


धर्मप्रसारके मध्य मैंने पाया है कि आजकल अनेक लोग जो विदेशोंमें या महानगरोंमें रहते हैं, वे प्रतिदिन स्नान नहीं करते हैं और यदि उनसे पूछती हूं तो वे निर्लज्ज होकर कहते हैं कि कल तो स्नान किया ही था और यदि प्रतिदिन स्नान न करें तो इससे क्या हानि होनेवाली है ?  समाजके ऐसे वर्गके लोगोंको स्नानके सन्दर्भमें सर्व भ्रम दूर हों एवं वे संस्कारी बनें, इस हेतु यह प्रश्न, शंका समाधान अन्तर्गत ले रही हूं ।
अ. रात्रिकलमें सोते समय निर्माण हुए तमोगुणके आवरणको नष्ट करने हेतु करें प्रातःकाल स्नान
रात्रि-निद्राके पश्चात सामान्य व्यक्तिका तमोगुण बढ जाता है एवं शौचादिसे निर्वृत्त होनेके क्रममें शरीरमें मल-मूत्र विसर्जनके समय भी हमारा तमोगुण बढ जाता है; अतः इस तमोगुणके आवरणसे मुक्ति पाने हेतु प्रातःकाल स्नान करें  । वैसे तो आदर्श स्नानका काल सूर्योदयसे पूर्वका है, प्रकृति भी इस तथ्यकी पुष्टि करती है और कुआं, नदी, पोखर अर्थात किसी जलाशयका जल भी, सूर्योदयसे पूर्व किसी भी ऋतुमें बहुत ठंडा नहीं होता है; अतः सूर्योदयसे पूर्व स्नान करनेका नियम बनाएं  । तत्पश्चात योगासन एवं प्राणायाम करें । इससे आपके शरीरकी काली शक्तिका (नकारात्मक तत्त्वका) विघटन होकर, मन तथा बुद्धिपर निर्माण हुआ काला आवरण नष्ट होता है जिससे शरीर और मन दोनों ही स्वस्थ रहते हैं ।
आ. शीतकालमें भी अवश्य करें प्रतिदिन स्नान
कुछ लोग शीतकालमें स्नान नहीं करते हैं और कहते हैं कि इस कालमें तो स्वेद (पसीना) नहीं निकलता है; अतः प्रतिदिन स्नान करनेकी आवश्यकता नहीं होती है; किन्तु हमारे हिन्दू धर्ममें कार्तिक और माघ मासमें सूर्योदय पूर्व स्नानका अत्यधिक महत्त्व है और इसे पवित्र एवं पुण्य फलदायी स्नान माना गया है, इससे सिद्ध होता है कि चाहे कोई भी ऋतु हो स्नान अवश्य करना चाहिए ।
इ. स्त्रियां बिना स्नानके न बनाएं भोजन
स्त्रियोंने तो बिना स्नानके रसोईघरमें प्रवेश करना ही नहीं चाहिए, यह उन्होंने नियम बनाना चाहिए  । मैंने आजकलकी अनेक स्त्रियों, जो वैदिक संस्कृति अनुसार आचारधर्मका पालन नहीं करती हैं, उनकेद्वारा बनाए हुए भोजनपर सूक्ष्म काले आवरणकी मोटी परत देखी है, यह उनके देह और हाथसे विसर्जित होनेवाली सूक्ष्म काली शक्तिका ही परिणाम होता है, ऐसा भोजन करनेसे अनेक प्रकारके शारीरिक और मानसिक कष्ट होते हैं  ।
ई. पुरुष करें प्रातःकालके समयका साधना हेतु सदुपयोग
वैसे ही पुरुषोंने प्रातःकालका समय साधनाको देना चाहिए, इस हेतु अपने नित्यकर्मसे निवृत्त होकर सर्वप्रथम स्नान करना चाहिए  । आजकल अनेक पुरुष सूर्योदयके पश्चात उठते हैं, प्रातःकाल पहले चाय पीते हैं और उसके पश्चात समाचार पत्र पढनेमें प्रातःकालका समय व्यर्थ करते हैं ! ध्यान रहे, ब्रह्म मुहूर्तसे सूर्योदय तकका काल साधना हेतु अत्यन्त पोषक होता है, इस कालमें वैदिक संस्कृति अनुरूप दिनचर्याका पालन करनेसे व्यक्तिमें तेजस्विता आती है और वह धन-धान्य, सुख-समृद्धि, पुत्र-पौत्रादिकी प्राप्तिके साथ ही ईश्वरीय कृपाका पात्र बनता है  ।
उ. प्रातः साढे आठ बजेसे पूर्व अवश्य कर लें स्नान
ब्रह्म मुहूर्तसे प्रातःकाल साढे आठ बजेतक वातावरणमें सात्त्विकता रहती है, उसके पश्चात जब सभी प्राणी अपने उपजीविकाकी व्यवस्था हेतु मग्न हो जाते हैं तो वातावरणमें रजोगुणमें वृद्धि होती है; ऐसेमें स्नान करनेसे सात्त्विकतामें अत्यल्प प्रमाणमें वृद्धि होती है; अतः अपना नित्यकर्म, स्नान और साधना ब्रह्म मुहूर्तसे प्रातःकाल साढे आठ बजे तक समाप्त करें और यह सुसंस्कार अपने बच्चोंमें अंगीकृत करें  ।
ऊ. अनिष्ट शक्तियोंसे रक्षण हेतु करें प्रतिदिन स्नान
मैंने अनेक लोगोंको नियमित स्नान नहीं करते हुए पाया है, जब पूछती हूं तो वे कहते हैं समय नहीं मिला या आलस्य हो रहा था ! ऐसे सभी लोगोंने एक बातका ध्यान रखना चाहिए कि पिशाचोंको पुराने स्वेदकी (पसीनेकी) गन्ध अत्यन्त प्रिय होती है और आजकल अनेक लोग आधुनिक इत्र (deodrant) लगाकर उसी स्वेदवाले वस्त्रको पहनते हैं एवं नियमित स्नान नहीं करते हैं, ऐसे लोगोंके देहमें पिशाच सहज ही वास करते हैं, फलस्वरूप उन्हें अनेक प्रकारके शारीरिक और मानसिक रोग होते हैं; अतः अनिष्ट शक्तियोंसे रक्षण हेतु नियमित स्नान करें  । अनेक माताएं आजकल आलस्यवश या ममतावश या उनके बच्चेको शीतप्रकोप हो जाएगा, ऐसे कारणोंसे उन्हें स्नान नहीं करवाती हैं । ऐसे बच्चोंके देह भी मैंने भूतावेषित पाया है, जिसकारण उन्हें भिन्न प्रकारके शारीरिक और मानसिक कष्ट होते हैं !
‘उपासना’के आश्रममें देश-विदेशसे अनेक पुरुष कुछ समय साधना हेतु आते हैं और मुझे कुछ वर्ष पूर्व तक ऐसा लगता था कि स्त्रियां भावनाप्रधान होती हैं; अतः उन्हें मानसिक कष्ट अधिक होता है; किन्तु पिछले तीन वर्षोंमें मैंने पाया कि उपासनाके आश्रममें आनेवाले ७५ % पुरुषोंको मध्यमसे तीव्र स्तरका मानसिक कष्ट है, जो मूलत: आध्यात्मिक स्वरुपका होता है ।  अधिकांश पुरुषोंको कोई न कोई व्यसन रहता है और वे अत्यधिक अस्वच्छ, अव्यवस्थित एवं अनुशासनहीन रहते हैं और वे प्रतिदिन स्नान भी करना नहीं चाहते हैं । मैं पहले तो किसीसे कुछ नहीं कहती, मात्र उनकी दिनचर्या देखती हूं और कुछ समय पश्चात जब वे अपने शारीरिक और मानसिक कष्ट बताने लगते हैं तो ही मैं उन्हें यह सब दृष्टिकोण देती हूं ।
आज अधिकांश व्यक्ति वैदिक संस्कृति अनुसार धर्माचरण नहीं करते हैं; परिणामस्वरूप उनकी देह अनिष्ट शक्तियोंसे आवेशित हो जाती है  । अनिष्ट शक्तियोंसे (भूतादि) कोई प्रेम नहीं करता है; इसलिए उनसे आवेशित लोगोंको भी ऐसा लगने लगता है, जिसे अनेक बार लोग अवसाद (डिप्रेशन) समझते हैं !  जब अनिष्ट शक्तियोंको अपने अनिष्ट योनिमें रहनेका भान होता है तो वे रोने लगते हैं और उनसे आवेशित व्यक्ति भी या तो रोने लगता है या चुप रहता है, जब उन्हें अपनी भिन्न वासनाओंकी पूर्ति करनी होती है तो व्यक्ति भी उन वासनाओंके शिकार हो जाते हैं, जैसे कोई मद्य पीता है, कोई सिगरेट तो कोई काम वासनाके अनावश्यक विचारसे पीडित हो जाता है और अनेक पैशाचिक कर्म जैसे बलात्कार आदि करता है ! अर्थात देह व्यक्तिका और मन अनिष्ट शक्तियोंका; इसलिए वैदिक संस्कृति अनुसार आचरण कर अपने देह और मनको शुद्ध रखें एवं शरीर शुद्धिका महत्त्वपूर्ण भाग है, नित्य स्नान !



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