प्रेरक कथा – जो सर्वश्रेष्ठ हो, बस वही ईश्वरको समर्पित हो !


एक नगरमे एक महात्माजी रहते थे और नदीके मध्य भगवानका मन्दिर था और वहां प्रतिदिन कई व्यक्ति दर्शनको आते थे और ईश्वरको चढाने हेतु कुछ न कुछ लेकर आते थे । एक दिवस महात्माजी अपने कुछ शिष्योंके साथ नगर भ्रमणको गए तो मध्य पथमे उन्होंने एक फलवालेके पास एक व्यक्तिको देखा, जो कह रहा था कि कुछ सस्ते फल दे दो, भगवानके मन्दिर चढाने हैं । थोडा आगे बढे तो एक ‘दुकान’पर एक व्यक्ति कह रहा था कि दीपकका घी देना और वह घी ऐसा था कि उससे उत्तम तो तेल होगा । आगे बढे तो एक अन्य व्यक्ति कह रहा था कि दो सबसे हलकी धोती देना । एक पण्डितजीको और एक किसी औरको देनी है ।
 जब वो मन्दिर गए तो जो दृश्य वहां देखा तो वो अचम्भित रह गए ।
  उस राज्यकी राजकुमारी भगवानके समक्ष अपना मुण्डन करवा रही थी और वहांपर एक किसान, जिसके स्वयंके वस्त्र फटे हुए थे; परन्तु वह कुछ लोगोंको नूतन वस्त्र दान कर रहा था । जब महात्माजीने उनसे पूछा तो किसानने कहा, “हे महात्मन ! चाहे हम अधिक न कर पाएं; परन्तु हम अपने ईश्वरको वह समर्पित करनेकी इच्छा रखते हैं, जो हमारे भी भाग्यमें न हो और जब मैं इन वस्त्रहीन लोगोंको देखता हूं तो मेरा बडा मन करता है कि इन्हें उत्तम वस्त्र पहनाऊं ।” और जब राजकुमारीसे पूछा तो उस राजकुमारीने कहा कि हे देव ! एक नारीके लिए उसके सिरके केश अति महत्त्वपूर्ण हैं और वे उसकी बहुत शोभा बढाते हैं, तो मैंने सोचा कि मैं अपने इष्टदेवको वो समर्पित करूं, जो मेरे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है; इसलिए मैं अपने इष्टको वही समर्पित कर रही हूं ।
   जब उन दोनोंसे पूछा कि आप अपने इष्टको सर्वश्रेष्ठ समर्पित कर रहे हो तो फिर आपकी मांग भी सर्वश्रेष्ठ होगी, तो उन दोनोंने ही बडा सुन्दर उत्तर दिया । उन्होंने कहा, “हे देव ! हमें व्यापारी नहीं बनना है और जहांतक हमारी इच्छाका प्रश्न है तो हमें उनकी निष्काम भक्ति और निष्काम सेवाके अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहिए ।”
जब महात्माजी मन्दिरके भीतर गए तो वहां उन्होंने देखा कि वे तीनों व्यक्ति, जो सबसे निम्न गुणवत्ताका घी, धोती और फल लेकर आए थे, साथमें अपनी इच्छाओंकी एक बडी सूची भी साथ लेकर आए थे और भगवानके समक्ष उन मांगोंको रख रहे थे ।
तब महात्माजीने अपने शिष्योंसे कहा, “हे मेरे अतिप्रिय शिष्यों ! जो तुम्हारे लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हो, जो सम्भवतः तुम्हारे भी भाग्यमें न हो, जो सर्वश्रेष्ठ हो, वही ईश्वरको समर्पित करना और प्रतिपूर्तिमें कुछ मांगना मत और मांगना ही है तो बस निष्काम-भक्ति और निष्काम-सेवा । इन दोनोंके अतिरिक्त अपने मनमें कुछ भी इच्छा न रखना ।”
इसीलिए सदा स्मरण रखना कि भले ही थोडासा समर्पित हो; परन्तु जो सर्वश्रेष्ठ हो बस वही समर्पित हो ।


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