प्रेरक कथा – सन्त तुकारामद्वारा शिष्यका दोष निर्मूलन


एक अवसरका प्रसङ्ग है, सन्त तुकाराम महाराजके आश्रममें स्वभावदोषकी चर्चाके मध्य उनके एक शिष्यने, जो स्वभावसे कुछ उग्र था उनसे यह प्रश्न पूछा कि गुरुदेव, अत्यन्त विषम परिस्थितियोंमें भी आप पूर्णतः शान्तचित्त एवं सामान्य व्यवहार किस प्रकार रख पाते हैं, कृपया मेरी जिज्ञासा शान्त करें । सन्त तुकारामजीने उत्तर दिया, “मेरे द्वारा ऐसा इसलिए सम्भव है; क्योंकि मुझे तुम्हारा रहस्य ज्ञात है ।”
शिष्यने कौतूहलवश पुनः प्रश्न किया, “गुरुदेव, मेरा रहस्य बतानेकी कृपा करें !” सन्त तुकारामजीने दुःखी मनसे उत्तर दिया, “तुम्हारी मृत्युमें आगामी सात दिवस मात्र ही शेष हैं ।” अपने गुरुके मुखसे ये शब्द सुनकर वह शिष्य हतप्रभ रह गया तथा दुःखी मनसे गुरुको प्रणामकर उसने वहांसे प्रस्थान किया । किसी अन्यके मुखके ये उद्गार होते तो वह उनका उपहास भी कर सकता था; किन्तु स्वयं गुरुदेव तुकाराम महाराजके मुखसे निकले शब्द व्यर्थ कैसे हो सकते हैं ? उसने विचार किया कि अब मेरे जीवनके मात्र सात दिवस ही शेष हैं; ये सात दिवस मैं अपने गुरुदेवद्वारा प्रदत्त विनय, प्रेम एवं ईश्वर भक्तिकी शिक्षाको मूर्तरूप देनेमें अर्पित करूंगा ।
तदुपरान्त उसके व्यवहारमें परिवर्तन प्रारम्भ हो गया । उसका वर्तन नम्रतापूर्ण हो गया । वह किसीपर भी क्रोध नहीं करता, प्रत्येक व्यक्तिसे प्रेमपूर्वक भेंट करता एवं अपने पापकर्मोंका प्रायश्चित करता, यदि किसीको उसके व्यवहारसे कभी कष्ट पहुंचा हो तो उनसे क्षमायाचना करता तथा अपने नित्य कर्मोंसे निवृत्त होकर दिवसका अधिकांश समय ईश्वरकी आराधनामें व्यतीत करता । इस प्रकार जब मात्र सातवां दिवस शेष रहा तो वह शिष्य अपनी मृत्युसे पूर्व अपने गुरु सन्त तुकाराम महाराजके दर्शनके उद्देश्यसे उनसे भेंट करने गया । शिष्यने गुरुसे निवेदन किया, “गुरुदेव, मेरी जीवनयात्रा समाप्त होनेवाली है, कृपया मुझे आशीर्वाद दें !” गुरुने उत्तर दिया, “शतायु भव ।”
अपने गुरुके मुखसे शतायु होनेका आशीर्वाद सुनकर शिष्यके आश्चर्यकी सीमा न रही । उसके मनोभावों को पढकर सन्त तुकाराम महाराजने उससे प्रश्न किया, “विगत सात दिवसका विवरण दो कि तुम्हारी दिनचर्या क्या थी ?, तुमने किन-किन व्यक्तियोंसे अनुचित व्यवहार किया तथा अपशब्द कहे ।” शिष्यने अत्यन्त विनम्रतापूर्वक कहा, “गुरुदेव, मेरे जीवनके मात्र सात दिवस शेष थे तो मैं इन्हें कैसे व्यर्थ जाने दे सकता था ? मैंने किसीपर भी क्रोध नहीं किया, प्रत्येक व्यक्तिसे प्रेम प्रेमपूर्वक मिला एवं अपने पापकर्मोंका प्रायश्चित किया; यदि किसीको मेरे व्यवहारसे कभी कष्ट पहुंचा हो तो उससे  क्षमायाचना की तथा विगत प्रत्येक दिवसका अधिकांश समय ईश्वरकी आराधनामें व्यतीत किया ।”
सन्त तुकाराम महाराजने हंसते हुए अपने शिष्यसे कहा, “मेरे सद्व्यवहारका रहस्य भी यही है; मैं सदैव यही विचार करता हूं कि मेरे जीवनके मात्र कुछ दिवस ही शेष हैं तथा कभी भी मेरी मृत्यु हो सकती है; अतः मैं प्रत्येक जीवसे प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूं तथा यही मेरे क्रोधपर नियन्त्रणका रहस्य है ।”  शिष्यने गुरुकी शिक्षाको त्वरित अपने हृदयमें अंगीकृत कर लिया तथा जीवनमें कभी क्रोध नहीं करनेकी मन ही मन प्रतिज्ञा की ।
सन्त तुकाराम महाराजने उसे जीवनकी अनमोल शिक्षा देने हेतु ही मृत्यु भय दिखाया था । ऐसे महान एवं निराले सन्त थे तुकाराम महाराज !


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