प्रेरक प्रसंग : मातृ-पितृ भक्तिका फल


महर्षि कश्यपके कुलमें उत्पन्न ब्राह्मण श्रेष्ठ पिप्पल अत्यन्त धर्मात्मा एवं तपस्वी थे । इन्द्रिय संयम, पवित्रता तथा मनको वशमें रखना, उनका स्वभाव बन गया था । उनके तपके प्रभावसे उनके तपस्थली दशारण्यके वन्य जीव-जन्तुओंकी एक-दूसरेसे स्वाभाविक शत्रुता भी नष्ट हो गई थी तथा सभी प्रेमपूर्वक साथ-साथ रहते थे । पिप्पलने इतना कठोर तप किया कि उनके शरीरके चारों ओर चीटियों तथा दीमकोंने अपना घर बनाकर अपनी मिट्टीसे उनका शरीर ढक दिया । उस मिट्टीके ढेरसे भी उनके शरीरका तेज अग्निकी लपटोंकी भांति बाहर आता था ।

पिप्पलकी तपस्यासे प्रसन्न होकर देवताओंने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर यह वरदान दिया कि सम्पूर्ण जगत तुम्हारे वशमें हो जाएगा । इस वरदानसे वे विद्याधर हो गए तथा जिसका चिन्तन करते वही उनके वशमें हो जाता । इस सिद्धिसे उन्हें अत्यधिक गर्व हो गया तथा वे स्वयंको संसारका सबसे महान तपस्वी व सिद्ध मानने लगे । इस गर्वने उनकी आध्यात्मिक उन्नति अवरुद्ध कर दी । उनका उद्धार करने हेतु स्वयं ब्रह्माजी सारसका स्वरूप धारण कर आए व बोले, “तुम्हें ऐसा अभिमान क्यों है कि जगतमें तुमसे महान कोई नहीं है ? यद्यपि तुमने तीन सहस्र वर्षोंतक तप किया है तथा सभीको वशमें करनेको सिद्ध भी हो; परन्तु तुम अब भी मूढ ही हो । तुम्हारा तत्त्वज्ञान अपूर्ण है । स्पष्ट सुन लो, कुंडलके पुत्र सुकर्मा विद्वान पुरुष हैं । संसारमें सुकर्माके समान कोई अन्य महाज्ञानी नहीं है । यद्यपि उन्होंने दान, ध्यान, हवन तथा यज्ञादि कर्म भी नहीं किए, तीर्थाटन भी नहीं किया; तथापि वे समस्त शास्त्रोंके ज्ञाता हैं । बालक होनेपर भी उन्हें जो ज्ञान प्राप्त हुआ है वह तुम्हें अभीतक नहीं प्राप्त है ।”

सारसकी बात सुनकर ऋषि पिप्पल शीघ्रतापूर्वक कुरुक्षेत्रमें स्थित विप्रवर कुंडलके आश्रमकी ओर चल पडे । वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि बालक सुकर्मा अपने माता-पिताकी सेवामें लीन हैं । कुंडलकुमार सुकर्माने पिप्पलजीको अपने निकट आया देखकर खडे होकर उनका स्वागत किया, उन्हें बैठने हेतु आसन दिया तथा उनके चरण धोए । उन्होनें विधिपूर्वक अतिथि सत्कार किया । इसके पश्चात बिना पूछे ही सुकर्माने ऋषि पिप्पलको बता दिया कि किसने, उन्हें किस उद्देश्यसे उनके पास भेजा है ?

उन्होंने उन्हें बताया कि तपस्या तथा सिद्धिसे उन्हें जो गर्व हो गया था उसे समाप्त करने हेतु ब्रह्माजी ही सारसके रूपमें उनके पास गए थे । ऋषि पिप्पलको अब भी अपनी सिद्धिका कुछ गर्व था । उन्हें विश्वास दिलाने हेतु सुकर्माने देवताओंका स्मरण किया । सुकर्माके स्मरण करते ही इन्द्रादि देवता वहां प्रकट हो गए । देवताओंका दर्शन कभी निष्फल नहीं होता; अतः सुकर्माने देवताओंके कहनेपर उनसे वरदान मांगा, “माता-पिताके चरणोंके प्रति मेरी सुस्थिर भक्ति हो तथा मेरे माता-पिता भगवान विष्णुके धामको पधारें !”

देवता वरदान देकर अपने लोक चले गए । अब ऋषि पिप्पलको सुकर्माकी शक्तिका विश्वास हो गया । उन्होंने परमात्माके निर्विशेष (प्राचीन) तथा सविशेष (अर्वाचीन) रूपका स्वरूप पूछा । सुकर्माने विस्तारपूर्वक उनके सम्मुख दोनों स्वरूपोंका वर्णन किया । पिप्पलजीने आश्चर्यचकित होकर पूछा, “आपकी आयु अत्यल्प है, आपने कोई तप किया हो ऐसा भी नहीं दीखता; किन्तु आपका प्रभाव तथा ज्ञान अपार है । इसका कारण क्या है ?”

सुकर्माने कहा, “ब्राह्मण, मैंने यज्ञ, धर्मानुष्ठान, ज्ञानोपार्जन तथा तीर्थयात्रा आदि कुछ भी नहीं किया है । कोई अन्य पुण्यकर्म भी मेरेद्वारा नहीं हुआ है । मैं तो मात्र माता-पिताकी सेवा ही जानता हूं । मैं अपने हाथसे ही माता-पिताके चरण धोता हूं । उनके शरीरकी सेवा करता हूं तथा उन्हें भोजनादि कराता हूं । आलस्य छोडकर मैं सदैव अपने माता-पिताकी सेवामें लगा रहता हूं । जबतक मेरे माता-पिता जीवित हैं, मुझे उनकी सेवाका अलभ्य लाभ मिल रहा है, तबतक मुझे तपस्या तीर्थयात्रा या अन्य पुण्यकर्मोंसे क्या प्रयोजन है ? विद्वान पुरुष यज्ञादि करके जो फल पाते हैं, माता-पिताकी सेवासे ही मैंने उसे प्राप्त कर लिया है । जहां माता-पिताका निवास है, वहीं सन्तान हेतु गंगा, गया तथा पुष्कर तीर्थ हैं । जो सत्पुत्र माता-पिताके जीवित रहते उनकी सेवा करता है, उसपर देवता तथा महर्षिगण प्रसन्न होते है । पिताकी सेवासे तीनों लोक प्रसन्न होते हैं । जो पुत्र प्रतिदिन माता-पिताके चरण धोता है, उसे नित्य गंगास्नानका फल प्राप्त होता है । जिस पुत्रने ताम्बूल, वस्त्र, खाद्य सामग्री आदिसे माता-पिताका पूजन किया है वह सर्वज्ञ हो जाता है । द्विजश्रेष्ठ, माता-पिताको स्नान कराते समय उनके शरीरसे जो जलके छींटे पुत्रपर पडते हैं,  उससे उसको सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नानका फल प्राप्त होता है ।

जिसने माता-पिताका आदर नहीं किया, उसके यज्ञ, तप, दान, पूजन सभी शुभ कर्म निष्फल एवं व्यर्थ हैं । पुत्रके लिए तो माता-पिता ही धर्म, तीर्थ, मोक्ष, यज्ञ, दान तथा जन्मके सर्वोत्तम सर्व फल हैं ।”

अन्ततः सुकर्माने कहा, “पुत्रके लिए माता-पितासे बढकर अन्य तीर्थ नहीं है । माता-पिता इस लोक तथा परलोकमें भी नारायणके समान हैं । मैं प्रतिदिन माता-पिताकी सेवामें लगा रहता हूं, इसीके फलस्वरूप तीनों लोक मेरे वशमें हो गए हैं । मेरी सर्वज्ञताका कारण माता-पिताकी सेवा ही है एवं यही मेरे ज्ञानका कारण है ।”

सुकर्माने अनेक अन्य व्याख्यान भी ऋषि पिप्पलको सुनाए । उनके उपदेशोंको सुनकर उनका गर्व समाप्त हो गया । अपने पिछले गर्वके कारण वे लज्जित हुए । सुकर्मासे आज्ञा लेकर तथा उन्हें प्रणाम करके वहांसे प्रस्थान किया ।



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