अधिकतर पुजारियोंद्वारा होनेवाली देवालयके देवोंकी मूर्तियोंकी ‘अतिपरिचयात् अवज्ञा’


अधिकतर पुजारियोंद्वारा होनेवाली देवालयमें देवताओंकी मूर्तियोंकी ‘अतिपरिचयात् अवज्ञा’
‘देवालयके पुजारी वहांकी मूर्तियोंके सन्निकट वर्षोंसे सातत्यसे रहते हैं; इसलिए वे अधिकतर यन्त्रवत हो जाते हैं । ‘अतिपरिचयात् अवज्ञा’ अर्थात अतिपरिचयसे अनादर होता है, इस सिद्धान्तानुसार उनका वर्तन भी देवताओंकी मूर्तियोंके सन्दर्भमें वैसा ही होता है । इसके विरुद्ध, देवालयमें आए कुछ भक्तोंका भाव क्षणभरके दर्शनसे भी जागृत हो जाता है । यह ध्यानमें रखते हुए, पुजारी होनेका लाभ मिले, इस हेतु पुजारियोंको माता-पिताकी सेवा वर्षोंतक यन्त्रवत न करनेवाले श्रवणकुमारका आदर्श सामने रख, पूजा करनी चाहिए । श्रवणकुमार अमर हुए, उसीप्रकार पुजारियोंद्वारा पूजा मनसे तथा भावपूर्ण हो, तो उन्हें भी नित्य नूतन अथवा आनन्ददायी अनुभूतियां होंगी एवं इससे उनकी पूजाकी यान्त्रिकता दूर हो जाएगी ।’ – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था



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