पूर्णकालिक साधक कैसे करें त्याग ?


‘अध्यात्म त्यागका शास्त्र है’, यह बतानेपर एक पूर्णकालिक साधकने कहा कि मैं तो अपना सब कुछ छोडकर यहां आया हूं, अब मैं क्या त्याग कर सकता हूं ?
यह सत्य है कि एक पूर्णकालिक साधक अपना सुख-ऐश्वर्य, धन, सगे-सम्बन्धी इत्यादि छोडकर आश्रममें आकर साधना करते हैं, ऐसेमें वे और कैसे त्याग कर सकते हैं ?, यह बताती हूं ।
१. उन्होंने समयका सदुपयोग करना चाहिए । उनका समय अब ईश्वरका समय होता है अतः उन्होंने प्रत्येक क्षण साधना हेतु पूरक कैसे हो ?, इसका विचार करना चाहिए ।
२. उसका देह गुरुकार्य हेतु है; अतः अपने देहका ध्यान ऐसे रखना चाहिए कि उसकी असतर्कता, आलस्य, जिह्वाके लोभ हेतु वह रोगी न हो जाए । इस हेतु नियमित अपनी क्षमता अनुसार सैर, व्यायाम, योगासन, प्राणायाम, इत्यादि नियमित करना चाहिए ।
३. उसने अपने मनका अभ्यास करना चाहिए कि दिनभरमें मायाके कितने विचार आते हैं या मन मायाकी ओर कितना भागता है अर्थात् मन ईश्वरका निवास्थान बनें, इस हेतु प्रयास करना चाहिए ।
४. अपने धनका भी उपयोग ऐसे करना चाहिए कि वह गुरुका धन है ऐसेमें जहां आवश्यक हो वहीं धनका व्यय करना चाहिए । मेरे किसी भी कृतिसे गुरु या ईश्वरके धनका अपव्यय तो नहीं हो रहा है इसका ध्यान रखना चाहिए ।
५. उसीप्रकार अहंके लक्षणोंका अभ्यास कर उसका भी परित्याग करनेका प्रयास करना चाहिए ! जैसे संन्यास  लेनेको  ईश्वरप्राप्ति होना या मोक्षप्राप्ति हो गया, यह नहीं समझा जा सकता है, उसीप्रकार पूर्ण समय साधना करनेका निर्णय लेना, यह मात्र साधनाका शुभारम्भ है, अन्त नहीं, यह ध्यान रखें ! अर्थात् जब मेरा सब कुछपर मात्र ईश्वरका अधिकार है, यह बोध होने लगे और उसी अनुरूप प्रत्येक क्षण कृति होने लगे तो आप समझ लें कि आपमें त्याग यह गुण आत्मसात हो गया है । – तनुजा ठाकुर  (२८.१२.२०१७)



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