आलस्यरहित हो स्वधर्मका पालन करें !


प्राचीनावीतिना  सम्यगयप्तव्यमतन्द्रिणा ।
पित्र्यमा निधनान् कार्यं विधिवद्दर्भयाणिना ॥ – मनुस्मृति (३:२८०)

अर्थात पुत्रको जीवन भर श्राद्ध-तर्पण आदि कर्म करने चाहिए । उसे इस हेतु सदैव दाहिने कंधेपर यज्ञोपवित रखकर, आलस्य रहित होकर हाथमें कुशाएं लेकर तथा बाईं ओर होकर श्रद्धाके साथ शास्त्र विधिका अनुसरण करना चाहिए । इस शास्त्र वचनका उल्लंघन करनेके कारण आजके अनेक पुत्रोंका जीवन क्लेशप्रद है । आलस्य और भोगमें लिप्त आजके निधर्मी एवं कृतघ्न पुत्रोंको अपने पितरोंके लिए समय नहीं होता; इसलिए अनेक पुत्रोंके पास सब होते हुए भी वे असन्तुष्ट एवं अशान्त रहते हैं । यह सब निधर्मी मैकाले शिक्षण प्रणालीके कारण ही हुआ है !



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