जनवरी ६, २०१९
झारखण्ड और छत्तीसगढमें आए दिन नक्सली मुठभेडके समाचार सामने आते रहते हैं । आज हम आपको जो समाचार बताने जा रहे हैं, उसके पश्चात आपका सम्मान सुरक्षा बलोंके प्रति और भी बढ जाएगा । मानवताकी रक्षामें हमारी सेना और सुरक्षाबल सदैव आगे रहे हैं । इसका ही एक उदाहरण झारखण्डमें उस समय देखनेको मिला, जब एक मुठभेडमें चोटिल हुए नक्सलीको बचानेके लिए ‘सीआरपीएफ’के तीन सैनिक सामने आए । उन्होेंने इस नक्सलीकी न केवल रक्त देकर प्राण बचाए, वरन मानवताके लिए एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया ।
कोबरा बटालियन और नक्सलियोंके मध्य हुई सीधी गोलीबारीमें एक नक्सली गंभीर रूपसे चोटिल हो गया था । इस नक्सलीको सुरक्षाबलोंने मुठभेड स्थलसे निकालकर रांचीके ‘राजेंद्र इंस्टिट्यूट मेडिकल साइंसेज’में प्रविष्ट कराया । चोटिल नक्सलीको जब तक चिकित्सालयमें प्रविष्ट कराया गया, उसका काफी रक्त बह चुका था । उसको तुरन्त यक्त चढानेकी आवश्यकता थी । जब ‘सीआरपीएफ’को इस बातकी सूचना मिली तो कांस्टेबल रतन मंजुलकर सहित परविन्दर और मेहबूब पीराने मानवताका उदाहरण प्रस्तुत करते हुए नक्सलीके लिए रक्तदान करनेका निर्णय किया । राजकमल कोबरा बटालियनसे सम्बन्धित हैं, जबकि चोटिल नक्सलीका नाम लिंगा सोडी है । लिंगाको बचानेके लिए सैनिक लगभग आठ कि.मी.तक उसको अपनी पीठपर पैदल लेकर चले थे । उसको पहले चिकित्सालय लाया गया, यहांसे उसको विमानतलके हेलीकॉप्टरसे तुरन्त जगदलपुरके शासकीय चिकित्सालय पहुंचाया गया ।
यह प्रथम अवसर नहीं है, इसके पूर्व भी ‘सीआरपीएफ’ने किसी शत्रुके प्राण बचाए हैं । इसके पूर्व भी गत वर्ष ८ फरवरी, २०१८को पलामूमें एक महिला नक्सली मंजू बैगा चोटिल हो गई थी । ‘सीआरपीएफ’ने घटनास्थलसे निकाल चिकित्सालयमें प्रविष्ट कराया था । इस महिलाको ‘सीआरपीएफ’के सैनिक गुलजारने रक्त दिया था ।
“भारतीय सेनाका यह कृत्य इस देशकी मिट्टीके संस्कार हैं, जो न ही अधिकृत करना चाहते हैं, न ही अत्याचार और अवसर पडनेपर शत्रुओंको भी क्षमादान देकर अपना बनाना जानते हैं; इसलिए ही भारतीय सेना सबसे उत्तम है ।”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जागरण
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