परिशोधित अर्थात रिफाइण्ड तेलसे होनेवाली हानियां एवं उसके विकल्प


भोजन हमारे शरीरकी ऊर्जाका एक प्रमुख स्रोत है । हमारे भोजनमें सात प्रमुख तत्त्व माने गए हैं, ये हैं ‘प्रोटीन’, ‘कार्बोहाइट्रेड’, ‘वसा’, खनिज तत्त्व, ‘विटामिन्स’, रेशा (फाइबर) व जल । आजकल रासायनिक उर्वरकोंसे उत्पन्न खाद्य पदार्थ एक तो वैसे ही पर्याप्त पोषक नहीं होते, उसपर इनमें रासायनिक प्रक्रियासे उन्हें और भी विषैला बना दिया जाता है । जैसे वसासे पोषक तत्त्वोंको निकाल कर उसे विषैला बनानेका कार्य आजकल एक सामान्य प्रक्रिया है । वसा हमारे शरीरके लिए बहुत आवश्यक है । वसाका मुख्य स्रोत्र तेल, घी और मक्खन है; परन्तु आजकल अखाद्य बीजोंसे तेल निकाल कर उन्हें परिशोधित (रिफाइण्ड) कर खाने योग्य बनाया जाता है । परिशोधित तेल दिखता स्वच्छ है, स्वादिष्ट भी होता है; परन्तु शीघ्र ऑक्सीकृत हो जाता है जिससे शरीरमें कर्करोग फैलानेवाले हानिकारक पदार्थ जैसे ऐक्रिलेमाइड, फ्री रेडिकल आदि बनते हैं अर्थात तेलको परिशोधित करनेके उपक्रममसे बहुतसे घातक रसायन इसमें जुड जाते हैं, यद्यपि इनको पुनः निकाल दिया जाता है; परन्तु इनको १०० प्रतिशत बाहर नहीं निकाला जा सकता है । तेलको परिशोधित करते समय कई प्रकारके रसायनोंका बडी मात्रामें उपयोग किया जाता है जिसके कारण इसमें रसायन बडी मात्रामें होते हैं और सभी अकार्बनिक अथवा कृत्रिम होते हैं; इसलिए एक प्रकारसे धीमे विषके समान कार्य करते हैं और धीरे-धीरे शरीरकी कार्यप्रणालीपर कुप्रभाव डालते हैं । इसलिए परिशोधित तेलके कुछ और कुप्रभावोंको भी हम जानना अति आवश्यक है –
जर्मन वसा वैज्ञानिक डॉ. बुडविगने तो बताया है कि इनसे कर्करोगतक होता है । प्रसिद्ध डॉ. योहाना बुडविज मूलतः वसा विशेषज्ञ थीं, जिन्होंने ‘पेपर क्रोमेटोग्राफिक’ तकनीक विकसितकी थी । डॉ. बुडविगके अनुसार ‘रिफाइण्ड’ तेल स्वास्थ्यके लिए हानिकारक है । परिशोधित तेलमें मधुमेह, हृदय रोग व कर्करोग उत्पन्न करनेवाले घातक तत्त्व होते हैं ।
भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थानके (AIIMS के) चिकित्सकोंके परीक्षणके अनुसार  भी परिशोधित तेल नहीं उपयोग करना चाहिए ! तेलके परिशोधनकी प्रक्रियामें तेलमेंसे चिपचिपापन और गन्धको निकाल दिया जाता है; अतः वह पदार्थ तेल ही नहीं रहता,; क्योंकि इस प्रक्रियासे तेलके सारे महत्त्वपूर्ण घटक निकल जाते हैं और ‘डबल रिफाइण्ड’में तो कुछ भी नहीं रहता और उसीको हम खा रहे हैं तो तेलके माध्यमसे जो कुछ पौष्टिकता हमें मिलनी चाहिए वह मिल नहीं रही है ।” तेलके माध्यमसे हमको विशिष्ट तत्त्व HDL (High Density Lipoprotein) मिलता है, वैसे तो यह यकृतमें (लीवरमें) बनता है; परन्तु इस हेतु शुद्ध तेल होना अनिवार्य है । शुद्ध तेल खानेसे आपका HDL अच्छा रहेगा और जीवन भर हृदय रोगोंकी आशंका नहीं रहेगी ।
परम्परागत घानीसे निकले तेलमें बहुत तीव्र गन्ध आती है, जिसकारण सरसोंके तेलका उपयोग कुछ लोगोंको रुचिकर नहीं लगता; परन्तु शोध ये बताते हैं कि तेलमें जो गन्ध होती है, वही उसका सबसे महत्त्वपूर्ण घटक होता है; क्योंकि वो वस्तुतः ‘प्रोटीन’ होता है और परिशोधितमें तेलमेंसे वो चिपचिपापन और गन्ध निकाल दी जाती है, जिसके कारण तेलके गुण उसमें रह ही नहीं जाते हैं जो प्राकृतिक तेलमें होते हैं; इसलिए कोई भी मनुष्य जो रसायन विज्ञानकी सामान्य जानकारी रखता हो, वह कभी भी परिशोधित तेलका उपयोग नहीं करेगा; क्योंकि इसके बहुत सारे कुप्रभावोंके सम्बन्धमें वो जानता है | आहार विशेषज्ञ बताते है कि दालोंमें सबसे अधिक प्रोटीन होता है और इनके उपरान्त सबसे अधिक प्रोटीन तेलमें होता है; परन्तु तेलोंमें प्रोटीनके साथ ‘फैटी एसिड’ भी होता है, जिसको परिशोधित कर देनेके पश्चात उसमें ये दोनों ही नहीं बचते हैं और ऐसा तेल एक प्रकारसे विषैले रसायनयुक्त पानी है । जिसके साथ आप भोजन तो पका सकते हैं; परन्तु इससे स्वास्थ्यको कोई लाभ नहीं होता; अपितु हानि होती है ।

परिशोधन (रिफाइन) करनेकी विधिके समय ६ से ७ रसायनोंका प्रयोग किया जाता है और ‘डबल रिफाइन’ करनेमें ये संख्या १२-१३ हो जाती है । ये सब रसायन मनुष्यके द्वारा प्रयोगशालामें बनाए हुए हैं, एक भी रसायन प्राकृतिक नहीं होता अर्थात जैविक (आर्गेनिक) नहीं होता । तेलको स्वच्छ करनेके ये रसायन अखाद्य है और ये रसायन ही विष हैं; अतः परिशोधित (रिफाइन) तेल, डबल रिफाइन तेल खाना पूर्णत: टालें !
परिशोधित तेल बनानेके तिलहनको २००-५०० डिग्री सेल्सियसके मध्य कई बार तपाया जाता है । साथ ही बीजोंसे १००% तेल निकालनेके लिए घातक ‘पैट्रोलियम’ उत्पाद ‘हेग्जेन’का प्रयोग किया जाता है, जिससे ‘एचएनई’ नामक जीव विष (टॉक्सिक) पदार्थ सृजित होता है । इसका निर्माण ‘लिनोलिक एसिड’के ऑक्सीकरणसे होता है । यह घातक तत्त्व उत्तकोंमें प्रोटीन व अन्य आवश्यक तत्त्वोंको क्षति पहुंचाता है । इसके कारणसे अनेकानेक रोग (ऐथेरास्क्लिरोसिस, स्ट्रोक, पार्किंसन , एल्जाइमर, यकृत आदिके रोग) हो सकते हैं । परिशोधित तेलसे शरीरके ओमेगा ३ व ओमेगा ६ का अनुपात बिगड जाता है जो अनेक रोगोंका कारण बनता है ।
चिकित्साशास्त्रियोंके अनुसार शरीरमें ओमेगा ३ और ओमेगा ६ का अनुपात सामान्य (१:१ या १:२) रखना आवश्यक है ।

परिशोधित तेलके प्रयोगसे होनेवाली अन्य हानियां :

  • पक्षाघात (लकवा) : रक्त प्रवाह सुचारू रूपसे न होनेके कारण शरीरको पक्षाघात भी हो सकता है ।
  • ‘ब्रेन डैमेज’ : परिशोधित तेलका सेवन करनेसे आपके मस्तिष्कपर भी कुप्रभाव पडता है, यदि आप इसका बहुत अधिक मात्रामें सेवन करते हैं तो इससे आपकी सोचनेकी क्षमतापर असर पडता है ।
  • नपुंसकता : यह तेल पुरुषोंमें नपुंसकताको बढाता है, यह पुरुषोंमें शुक्राणुओंकी वृद्धि रोककर उन्हें आलसी और अकर्मण्य बना देता है ।
  • गर्भवती महिलाओंके लिए हानिकारक : गर्भवती महिलाओंको इसका सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए, इसमें विद्यमान विषैले तत्त्वोंसे नवजात शिशुको कई रोग हो सकते हैं ।
  • गठिया : पित्त-सान्द्रवसे (कॉलेस्ट्रॉलसे) बचनेके लिए हम जिस परिशोधित तेलका प्रयोग करते हैं, वह हमारे शरीरके आन्तरिक अंगोंसे प्राकृतिक चिकनाई भी छीन लेते हैं । इससे शरीरको आवश्यक ‘फैटी एसिड’ भी नहीं मिल पाते और आगे चलकर जोडों सम्बन्धी समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं, जबकि सामान्य तेलमें उपस्थित चिकनाई शरीरको आवश्यक वसा (फैटी एसिड) प्रदान करती है, जो अत्यधिक लाभकारी होती है ।

वे तेल जो परिशोधित तेलके स्थानपर प्रयोग करने चाहिए :
•  तिल : तिलका तेल भोजनको एक विशिष्ट स्वाद प्रदान करता है । इस तेलमें ऑक्सीकरण रोधी (एंटीऑक्सीडेंट्स ) और प्रज्ज्वलनरोधी (एंटी-इन्फ्लेमेट्री) यौगिक होते हैं, जो हृदयके रोगोंसे लडनेमें सहायक होते हैं ।
• मूंगफली : मूंगफलीके तेलमें दानोंका स्वाद होता है । यह ‘ट्रांसफैट’ मुक्त, पित्त सान्द्रव (कोलेस्ट्राल) मुक्त होता है तथा इसमें हानिकारक ‘सेचुरेटेड फैट’ अल्प होते हैं । इसके अतिरिक्त यह विटामिन ई, ऑक्सीकरण रोधी (एंटीऑक्सीडेंट्स) और ‘फायटोस्टेरोल्स’का अच्छा स्त्रोत है, जो हृदयको स्वस्थ रखनेमें सहायक होते हैं ।
•  सरसों : यह बहुत लोगोंको रुचिकर (पसन्द) नहीं होता; परन्तु वे लोग जो इस तेलका उपयोग करते हैं, उनका चुनाव बहुत अच्छा है । इसका एक भिन्न स्वाद होता है, उच्च धूम्रबिन्दु होता है और यह ‘पॉलीअनसेचुरेटेड’ होता है ।
• नारियल तेल : समुद्रतटीय प्रदेशोंमें रहनेवालोंके लिए नारियल तेल सभी प्रकारसे उपयुक्त खाद्य तेल है ।
• जैतून (ऑलिव) : खाद्य क्षेत्रमें वैश्वीकरणके साथ-साथ संसारके एक भागके व्यंजनोंको दूसरे भागमें ले जाए गए । प्रामाणिक स्वाद प्राप्त करनेके लिए तेलके विभिन्न प्रकार भी एक स्थानसे दूसरे स्थान ले जाए गए जिनमें जैतूनका तेल भी है । इस स्वादयुक्त तेलमें ‘पॉलीफेनल्स’ नामक ऑक्सीकरण (एंटी ऑक्सीडेंट) होते हैं जो हृदयको स्वस्थ रखते हैं; अत: यह भी खाद्य तेलोंका एक श्रेष्ठ विकल्प है ।
तो इस प्रकार हमने जाना कि परिशोधित तेल कितने हानिकारक हैं और इनके सेवनसे बचना कितना आवश्यक है; परन्तु विकल्प क्या हैं ? हमारे पास ऐसे यन्त्र उपलब्ध हैं जो घरमें ही तिलहनसे तेल निकालनेका कार्य सरलतासे कर सकते हैं । यदि आप इसे लेने हेतु इच्छुक है तो आप हमसे ९७१७४९२५२३/९९९९६७०९१५ पर या [email protected] par संपर्क कर इस यन्त्रके विषयमें और जानकारी प्राप्त कर, इसे हमसे क्रय कर सकते हैं । इस यंत्रसे घरमें कोई भी अपनी इच्छानुसार बीजसे तेल निकाल सकते हैं ।



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