इलाहाबाद उच्च न्यायालयने बहुसङ्ख्यकोंके धर्मान्तरणको बताया राष्ट्रके निर्बल बननेका कारण, कहा धार्मिक कट्टरताका देशमें कोई स्थान नहीं


०२ अगस्त, २०२१
           इलाहाबाद उच्च न्यायालयने झूठ बोलकर धर्म परिवर्तन करवानेके पश्चात ‘निकाह’ करनेवाले आरोपी जाबिद अंसारीके प्रतिभूति आवेदनको अस्वीकार कर दिया है । न्यायालयने स्पष्ट रूपसे कहा कि संविधान सभीको इच्छाके अनुसार किसी भी पन्थको माननेका अधिकार देता है; परन्तु मात्र ‘निकाह’के लिए पन्थ परिवर्तन करना स्वीकार नहीं है । समाचारके अनुसार, प्रकरण अन्तर्गत पीडित युवतीने वर्णन किया कि वह १७ नवंबर २०२० की सन्ध्याको जलेसरकी विपणिमें गई थी । वहां कुछ लोगोंद्वारा उसका अपहरण किया गया, जिसके पश्चात उसे कुछ खिलाकर अचेत कर दिया गया । अगले दिवस उसने स्वयंको कडकडडूमा न्यायालयमें पाया, जहां एक श्वेत कागदपर उर्दूके कुछ शब्द लिखनेके पश्चात उससे हस्ताक्षर कराए गए । इसके उपरान्त २८ नवम्बरको आरोपीने उससे ‘निकाह’ कर लिया । तब पीडिताने किसी प्रकार पुलिसको इसकी सूचना दी और २२ दिसम्बरको पुलिसने पीडिताको प्राप्त किया । अब प्रकरणमें बन्दी बनाए गए जाबिदने उच्च न्यायालयमें प्रतिभूति हेतु आवेदन दिया था, जिसे न्यायालयद्वारा अस्वीकार कर दिया गया । आरोपीने यह भी कहा कि पीडिता और वह दोनों वयस्क हैं व पीडिताने अपनी इच्छासे धर्म परिवर्तनकर उससे ‘निकाह’ किया था ।
        जिहादी समुदायके लोग जब विधानोंका पालन ही नहीं करते, तो उन्हें ‘लव जिहाद’के विधेयकोंसे उन्हें भय कैसा ? ऐसे हिन्दूद्रोहियों हेतु अब मृत्युदण्ड ही एक उपयुक्त पर्याय है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : डू पॉलिटिक्स


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