षड्गुणयुक्त (श्री, यश, ऐश्वर्य, धर्म, ज्ञान, वैराग्य) ईश्वरसे एकरूप होने हेतु साधकको अपने षड्रिपुओंका (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मत्सर) र्निमूलन करना अति आवश्यक होता है । जैसे तेल और जलका मिलना तब तक संभव नहीं जब तक दोनोंमेंसे किसी एकका दूसरेके अनुरूप न हो जाए वैसे ही षड्रिपुओंसे युक्त साधकका ईश्वरसे एकरूपता तभी सम्भव हो सकता है, जब वह अपने हीन गुणोंको दूर कर दिव्य गुणोंको आत्मसात करे ।
इसी प्रक्रियाको स्वभावदोष एवं अहम् निर्मूलन प्रक्रिया कहते हैं । जैसे सुईसे धागे निकालने हेतु धागेका सर्व भाग सुईके दूसरी ओर आना अपेक्षित होता है वैसे ही हमारे भीतर यदि अंशमात्र भी षड्रिपु हो तो हम सत् चित आनन्द स्वरूपी परमेश्वरकी प्रतीति नहीं ले सकते हैं । – तनुजा ठाकुर (२३.९.२०१७)
(इसलिए वैदिक उपासना पीठद्वारा whatsapp पर यह प्रक्रिया आरम्भ की गयी है, जिसमें इस प्रक्रियाको करनेवाले व्यक्तिको चरण-दर-चरणका मार्गदर्शन दिया जायेगा, आप भी इसमें सहभागी होकर ईश्वरसे एकरूपता हेतु अग्रसर हो सकते हैं । इस हेतु आप ९९९९६७९१५ में मुझे व्यक्तित्व विकास गुटमें जोडें, यह सन्देश लिखकर भेज सकते हैं।)
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