सदैव ही अच्छी संगतमें रहनेका प्रयास करना चाहिए !
संगतिका प्रभाव पडता ही है; इसलिए सदैव ही अच्छी संगतमें रहनेका प्रयास करना चाहिए । अच्छी संगति हमें हमारी वृत्ति अनुरूप मिलती है । जैसे मद्यपिको मद्यपि, चोरको चोर और साधुको साधु स्वतः ही मिल जाता है ।
हमारी वृत्ति हमारे नित्यके आचरणसे बनती है; इसलिए आचरणको सात्त्विक रखना चाहिए एवं यदि कभी अयोग्य संगतिमें रहना पडे तो अपने विवेकके अनुसार आचरण करना चाहिए तथा अयोग्य संगतिका त्याग करना चाहिए; क्योंकि :
यादृशै: सन्निवसति यादृशांश्चोपसेवते ।
यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग्भवति पूरुष: ॥
यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव ।
वासो यथा रॾगवशं प्रयाति तथा स तेषां वशमभ्युपैति ॥
(महा. शान्ति. २९९ । ३२-३३)
अर्थात जिसके साथ रहता है, जिसकी सेवा करता है और जो जैसा होना चाहता है, वह वैसा ही हो जाता है । वस्त्र (कपडे) जैसे रंगसे रंगे जाते हैं, वैसे ही हो जाते हैं । ऐसे ही जो पुरुष, सन्त, असन्त, तपस्वी अथवा चोरका या जैसा संग करता है, वह वैसा ही हो जाता है ।
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