साधक किसे कहते हैं ?  (भाग – २)


कुटुम्ब व्यवस्थाका मूल आधार है, साधकत्व
हमारी कुटुम्ब व्यवस्थाका मूल आधार साधकत्व था, जहां दूसरोंकी इच्छाको प्रधानता देते हुए कुटुम्बके प्रत्येक सदस्य साधना एवं धर्माचरण करते हुए प्रेम एवं सौहार्दसे रहते थे । पूर्व कालमें एक गृहमें सौ सदस्योंका कुटुम्ब प्रेमपूर्वक, इसी साधकत्वके कारण रह पाते थे । आजकी कुटुम्ब व्यवस्था, संयुक्तसे एकल कुटुम्ब व्यवस्थामें सीमित हो गयी है, जहां चार सदस्य (माता-पिता और दो बच्चे) होते हैं, तब भी वे एक स्थानपर बैठकर, प्रेमपूर्वक पन्द्रह मिनिट भोजन भी नहीं कर पाते हैं । देखिए, साधकत्वका कितना ह्रास हुआ है; अतः समाजको धर्मशिक्षण देकर साधकत्व निर्माण करना अति आवश्यक है, अन्यथा हमारे यहां भी पुरुष और स्त्री विदेशी संस्कृति समान मात्र अपनी वासना तृप्ति या संतानोत्पत्ति हेतु एकत्र आएंगे एवं यहां भी विवाह जैसी सामाजिक संस्थाकी आवश्यकता नहीं होगी और सनातनी हिन्दू पशुत्वकी ओर अग्रसर होंगे !



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