साधक क्यों करे स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया ? (भाग – ९)


आदर्श साधक बनने हेतु करें अपना स्वभावदोष निर्मूलन
जब भी साधक नियमित साधना करता है तो उससे, उसके परिवारके सदस्य, मित्र, परिजन सभी आदर्श वर्तनकी अपेक्षा रखते हैं और जब यह नहीं होता है तो वे उसकी साधनाके सन्दर्भमें व्यंग्य करते हैं, जिससे साधकका मन अशांत हो जाता है ।
 जैसे कई बार स्त्रियां अपने पतिके कार्यालय जानेके समय बैठकर पूजा, स्तोत्र पठन या नामजप करती हैं, किन्तु पतिको यह अपेक्षा होती है कि वे कार्यालय जाने हेतु जो भी पूर्वतैयारी है, उसमें उनकी पत्नी सहायता करें । वैसे आदर्श स्थिति तो यह है कि यदि कोई साधना करे तो उसमें व्यवधान नहीं डालना चाहिए, किन्तु कलियुगमें अधिकांश पति-पत्नी योग्य साधना नहीं करते हैं या सम्बन्ध अनेक बार अन्य युगों समान साधना हेतु पूरक नहीं होता; अतः अपने जीवन-साथीसे साधनाके आरम्भिक कालमें यह अपेक्षा करना व्यर्थ है । ऐसेमें पत्नीने दूसरोंका विचार करना या परेच्छा अनुसार आचरण करनेका प्रयास करना चाहिए एवं पतिके कार्यालय जाने हेतु सर्व पूर्वसिद्धता करके ही अपनी साधना हेतु बैठना चाहिए और यदि पतिकी इच्छा यह है कि कार्यालय जानेसे पूर्व, वे उनके आस-पास ही रहें, तो पुनः पत्नीने ऐसा ही प्रयास करना चाहिए और पतिके कार्यालय जानेके पश्चात अपनी साधना करनी चाहिए । परेच्छामें रहनेके कारण, स्त्री साधिकापर ईश्वरीय कृपा सम्पादित होती है । ध्यान रहे, कलह कर या मन अशांत कर साधना करनेसे कोई सुफल प्राप्त नहीं होता है ।

 उसीप्रकार इटलीमें एक साधक हैं, उन्हें कॉफी एवं सिगरेट पीनेका व्यसन था, कॉफीका व्यसन इसलिए कहा, क्योंकि वे एक दिनमें १० से १५ कपटी (कप) काली कॉफी पीते थे ! वे प्रतिदिन दो-तीन घण्टे ध्यान करते थे, उनकी पत्नी यह स्वीकार करती थीं कि वे अच्छे आध्यात्मिक स्तरपर हैं, किन्तु वे सदैव यह कहती रहती थीं कि क्या साधकने व्यसनी होना चाहिए ? मैंने उन साधकको अपने वर्तनको आदर्श बनाने हेतु सर्व उपाय करने हेतु कहा और कुछ समय उपरान्त, साधकने दोनों ही व्यसन करना छोड दिया, इससे यह समझमें आता है कि आपमें कितनी भी अच्छाई हो, यह दिखाई देनेकी अपेक्षा यदि आप साधना करते हैं तो आपके परिजन आपके दोष देखते हैं और आपसे आदर्श वर्तनकी अपेक्षा रखते हैं; अतः अपने वर्तनको आदर्श करने हेतु अपने दोषोंको दूर करना अति आवश्यक है । – तनुजा ठाकुर (१.१०.२०१७)



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