साधक सीखनेकी वृत्ति निर्माण करें !


जब भी हम कोई नूतन सेवा करते हैं तो हमसे चूकें होती हैं, इसके पीछे उस सेवाके प्रति अनभिज्ञता एवं हमारे दोष उत्तरदाई होते हैं । कुछ साधक सेवा इसलिए नहीं करना चाहते हैं; क्योंकि उनसे चूकें होंगी और उनकी चूकें या तो उन्हें स्वयं बतानी पडेगी या उन्हें बताया जाएगा । (हमारे श्रीगुरुने हमें सेवाको परिपूर्ण करने हेतु उसे चूकविरहित करना सिखाया है और इसी क्रममें सेवाके मध्य होनेवाली चूकें हम स्वयं बताते हैं या हमें बताई जाती है) । ध्यान रहे, जब भी कुछ नूतन सीखनेका प्रयास करते हैं तो चूकें होती ही हैं; किन्तु यदि उस सेवाको आरम्भ करनेसे पूर्व यदि हम अच्छेसे अभ्यास कर लें और सतर्क रहे तो चूकें अपेक्षाकृत अल्प होंगी ! चूकोंके भयसे यदि हम कुछ नूतन करना या सीखना नहीं चाहते हैं तो हमारे सीखनेकी प्रक्रिया बंद हो जाएगी, इससे हमारी प्रगति भी रुक जाती है ! शास्त्र है जो सदैव कुछ नूतन सीखते रहता है वह दूसरोंको भी नित्य कुछ सिखा सकता है और सतत सीखते रहनेकी प्रकियासे अहं भी न्यून रहता है; क्योंकि उसे ज्ञात होता है कि अभी भी इस संसारमें बहुत कुछ सीखनेको है ! चूक करनेसे न भयभीत न हों, मात्र चूकें जान बूझकर नहीं करनी चाहिए एवं पुनः-पुनः एक ही प्रकारकी चूकें नहीं होनी चाहिए ! इस हेतु स्वाभावदोष निर्मूलन प्रक्रियाको सतर्कतासे करना चाहिए ।



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