साधकके गुण (भाग- १५)


सतत ईश्वर व गुरुसे अनुसन्धान रखनेवाला
साधकका मूल उद्देश्य अपने गुरु या ईश्वरसे एकरूप होना होता है; अतः वह जहां भी हो, जिस परिस्थितिमें भी हो, वह अपना अनुसन्धान ईश्वर या गुरुसे बनाए रखने हेतु प्रयत्नशील रहता है, यह उसकी विशेषता होती है ! इस हेतु वह अपने लक्ष्यको साध्य करने हेतु जो भी प्रयत्न आवश्यक हों या बताया गया हो, उसे वह निरन्तर करनेका प्रयास करता है | इसका यही गुण उसे ईश्वर या गुरुका प्रिय बनाता है | जिस साधकका अपने गुरु या ईश्वरसे सूक्ष्मसे जितना अधिक अनुसन्धान होता है वह उतना ही उच्च कोटिका साधक कहलाता है | जब यही अनुसन्धान ७०% तक हो जाता है तो वह साधक गुरु पदका सन्त कहलाता और जब यह १०० % हो जाता है तो वह मोक्षको प्राप्त कर लेता है ! वस्तुत: विपरीत परिस्थितियोंमें भी साधक अपना अनुसन्धान परम तत्त्वसे बनाए रखता है, उसके लिए इस तत्त्वसे दूरी दुःख होता है और इस तत्त्वसे सामीप्य सुख होता है | जिस साधकका मन मायाकी ओर अधिक भागता है, उसका ईश्वरसे उतना ही कम अनुसन्धान है, ऐसा समझ सकते हैं | ईश्वरसे अधिक जुडाव, लगाव या सामीप्य हो इस हेतु प्राथमिक अवस्थाके साधकने सत्संगमें जाना चाहिए, सत्सेवा करना चाहिए, गुरु या गुरुके आश्रममें भी नियमित जाना चाहिए तथा अपनी साधनाकी अखंडता हेतु प्रयास करना चाहिए | उन्नत साधकोंके संग रहनेसे भी ईश्वरसे अनुसन्धान कैसे साध्य कर सकते हैं ?, यह सीखने हेतु मिलता है |


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