साधकके गुण (भाग-७)


स्वच्छ रहना

आप सोचेंगे, यह भी कोई बतानेवाली बात है ?! किन्तु मैंने ऐसा अनुभव किया है कि जैसे-जैसे व्यक्ति तमोगुणी आचरण करता है, वह आलसी हो जाता है और इस कारण वह अव्यवस्थित एवं अस्वच्छ रहने लगता है । विशेषकर मैंने देखा है कि आजकी पीढीके अधिकांश युवावर्ग  बहुत ही अस्वच्छ रहते हैं, वह मात्र बाहरी टिप-टॉपमें विश्वास करते हैं, यदि आप उनका कक्ष या उनकी कपाटिका देख लें तो उसके दुर्गन्धसे आपको वमन हो जाए ! मैंने अनेक युवा पीढीके लोगोंके स्नानगृह, कपाटिका इतने अस्वच्छ पाए हैं कि आप उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं ! उनके कक्षसे शृंगार हेतु उपयोगमें लेनेवाले अनेक प्रकारके रासायनवाले ‘कॉस्मेटिक्स’ एवं भिन्न प्रकारके व्यसनसे उत्पन्न दुर्गन्धसे उनका कक्ष व्याप्त रहता है, इससे उनके कक्षमें मायावी आसुरी शक्तियोंका वास हो जाता है और एक विचित्रसी सूक्ष्म दुर्गन्ध आती है जो किसी भी सात्त्विक व्यक्तिके लिए असहनीय होता है ! जैसे वे प्रतिदिन स्नानके पश्चात स्वेदवाले (पसीनेवाले) वस्त्रमें कृत्रिम गन्ध छिडककर पहन लेते हैं, कई तो तीन-तीन दिनोंतक स्नान नहीं करते हैं ! काले वस्त्र आज युवा ही नहीं सभी व्यक्तियोंका सबसे प्रिय रंग हो गया है, इससे वस्त्र कितना अस्वच्छ है, यह ज्ञात नहीं होता !

 जैसे धर्मयात्राके मध्य मैं २०१५ में बेल्जियम गई थी, वहां एक सुप्रसिद्ध गुरुको माननेवाली एक साधिकाके घर रुकी थी | वे प्रतिदिन ५० माला जप करती थीं; किन्तु उनका घर इतना अस्वच्छ और अव्यवस्थित था कि उनके साधनाकी सब शक्ति उस घरमें रहनेवालीआसुरी शक्तियां खींच लेती थीं ! उनके रसोईघर और प्रशीतकसे(फ्रिजसे) तो ऐसी दुर्गन्ध आती थी कि मैं आपको बता ही नहीं सकती हूं, मैं उनके घर चार दिवस रुकनेवाली थी; किन्तु दो दिवस, जिसमें अधिकांश समय हम बाहर ही थे, अत्यधिक कठिनाईसे निकाली । वह स्त्री बहुत ही आलसी थी, जो थोडी बहुत स्वच्छता होती थी, वह उसके पति ही करते थे ।

इसीप्रकार मैं एक और विद्वान पुरुषके घर गई थी, उनके घरकी स्थिति तो ऐसी थी कि हमें बिठानेके लिए भी उनके घरमें स्थान नहीं था और उनका बिछावन और सोफा इत्यादि इतना अस्वच्छ था कि मुझे उनके कक्षमें बैठनेकी इच्छा ही नहीं हुई ! उनके घरकी दयनीय स्थिति देखकर उनकी विद्वतापर भी प्रश्नचिन्ह निर्माण हो रहा था ! वे एक शिक्षक थे और उन्हें बहुत अच्छा वेतन मिलता था, उनके घरमें उनकी पत्नी, पुत्रियां, पुत्रवधु सभी उच्च शिक्षित थे, किन्तु घरकी स्थिति ऐसी थी जैसे कोई वर्षोंसे वहां न रहता न हो,  मैं सोच रही थी कि ये महोदय समाजको क्या सिखाते होंगे ?! ध्यान रहे, अस्वच्छ लोगोंके मन एवं बुद्धिपर सूक्ष्म काला आवरण त्वरित निर्माण होता है और अनिष्ट शक्तियां शरीर और घरमें वास करने लगती हैं, जिससे अनेक प्रकारके यौन रोग, चर्म रोग एवं अन्य मानसिक व असाध्य रोग त्वरित होते हैं और वे अनिष्ट शक्तियोंद्वारा आवेशित होनेके कारण ठीक नहीं होते हैं !

ऐसे सभी साधकोंको एक सन्देश देना चाहूंगी कि स्वच्छ रहना, यह पवित्र होनेका प्रथम चरण है, स्वच्छताके पश्चात ही हम पवित्रताको धारण कर सकते हैं; अतः स्वयंको, अपने कक्षको एवं अपने वास्तुको स्वच्छ रखें !



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