साधकके गुण (भाग-८)


साधना करते समय धैर्यका होना

साधनाका पथ बहुत लम्बा, अदृश्य व कठिनतम होता है ! अनके बार साधना करनेपर यदि किसी साधकको त्वरित उसका प्रभाव नहीं दिखता है तो वे अपना धैर्य खो देते हैं और कुछके मनमें विकल्प आने लगता है, कुछ तो परिणाम न दिखाई देनेके कारण इतने निराश हो जाते हैं कि साधना ही छोड देते हैं ।  उसीप्रकार जब कोई साधक गुरुके शरणमें रहकर साधना करता है तो गुरुद्वारा बताए गए तथ्योंको सातत्यसे कुछ वर्षोंतक नहीं करता है, ऐसे साधकोंमें धैर्यके साथ ही गुरुके प्रति या ईश्वरके प्रति श्रद्धाका अभाव तो होता ही है, साथ ही उनमें दृढताका भी अभाव होता है ।

साधनाद्वारा हम मात्र इस जन्मके ही नहीं अपितु अनेक जन्मोंके संचित कर्मोंको नष्ट करते हैं, कई बार तो तीव्र प्रारब्धके कारण या अनिष्ट शक्तियोंके तीव्र कष्टके कारण साधनाके प्रथम कुछ वर्ष या तो प्रारब्धके कष्ट न्यून करनेमें या अनिष्ट शक्तियोंसे युद्ध करनेमें व्यर्थ हो जाते हैं जिससे अपेक्षित प्रगति नहीं होती है, ऐसेमें बिना निराश हुए इस पथपर अग्रसर होते रहना चाहिए तभी उन्हें कुछ परिणाम दिखाई दे सकता है ! गुरु और ईश्वर तो साधकमें धैर्यरूपी गुण विकसित हुआ या नहीं ?, इस हेतु साधकको कठिन या विपरीत परिस्थियोंमें डाल देते हैं ! ऐसेमें यदि साधक धैर्य धारणकर श्रद्धापूर्वक साधनारत रहता है तो उसे अपने लक्ष्यकी प्राप्ति अवश्य ही होती है ।

अल्प शब्दोंमें यह कहा जा सकता है कि जिसमें धैर्य नहीं होता वह साधना पथपर अधिक समय नहीं चल सकता है; अतः यह साधकका एक अवश्यम्भावी गुण होता है ।



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