साधकों, अपने घरकी वास्तुकी शुद्धि नियमित करें !


कुछ साधक जब साधना आरम्भ करते हैं तो अपने घरकी वास्तुकी शुद्धि नियमित करते हैं एवं जब वे थोडे समय साधना नियमित करने लगते हैं तो वास्तुकी शुद्धि छोड देते हैं ! साधको, ऐसा न करें ! जैसे हम अपनी स्वच्छता हेतु प्रतिदिन स्नान करते हैं , घरमें झाडू-पोछा करते हैं तो उसीप्रकार वास्तुकी सूक्ष्म शुद्धि अति आवश्यक होता है इसे अवश्य ही करें !
      इस विषयमें आपको अनेक बार बताया ही जा चूका है !
      सभी साधकोंने इस बातका ध्यान रखना चाहिए कि कलियुगमें साधनामें एक-एक चरण आगे बढना अर्थात एक युद्धको जीत लेना है; इसलिए तीन बातोंकाका सदैव ध्यान रखें एक तो स्वयंकी बाह्य शुद्धि नियमित करें, जैसे प्रातः स्नान करना, प्रतिदिन स्वच्छ वस्त्र धारण करना, मल-मूत्र त्यागके पश्चात अपनी जननेंद्रियोंको शीतल जलसे धोना एवं पैर हाथ स्वच्छ कर आचमनी करना | दूसरी बात है स्वयंकी सूक्ष्म शुद्धि करना अर्थात पञ्च तत्त्वका उपचार करना, योग्य मुद्रा एवं नामजपस्द्वारा स्वयंके सभी सूक्ष्म चक्रोंकी शुद्धि करना तथा अपने घरकी शुद्धि करना ! ये तीन कलियुगमें साधना हेतु अनिवार्य पहलु हैं !


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