साधना अत्यधिक दुःखमें नहीं हो पाती है, इसकी प्रतीति मन्दिरके समक्ष बैठे भिखारियोंसे ले सकते हैं | सम्पूर्ण जीवन देवालयके परिसरमें रहते हुए भी उनकी आध्यात्मिक प्रगति नहीं होती है | उसी प्रकार साधना बहुत सुखमें भी नहीं हो पाती है अन्यथा इस विश्वके सभी धनाढ्य व्यक्ति साधक बनकर अध्यात्म पथपर अग्रसर होते ! यदि अत्यधिक दुःख और अत्यधिक सुख होनेपर भी आप साधना कर रहे हैं तो समझ लें कि आपपर ईश्वरकी विशेष कृपा है !
Leave a Reply