कुछ दिवस पूर्व एक व्यक्ति आश्रम आए थे, उन्होंने कहा कि वे अपने पुत्र और पुत्रियोंकी शिक्षा और विवाहसे निवृत्त होकर साधना करेंगे !
इस प्रकारकी बातें अनेक व्यक्ति करते हैं; इसलिए इसपर दृष्टिकोणका होना अति आवश्यक है ! मायाके मोहसे कभी भी निकलना बहुत कठिन होता है । जिन्हें आज अपने पुत्र और पुत्रियोंकी शिक्षा और विवाहकी इतनी चिन्ता है कि वे वर्तमान समयमें थोडा भी समय ईश्वरके लिए नहीं निकाल सकते हैं तो क्या भविष्यमें वे अपने नाती-पोतेमें पुनः नहीं अटक सकते हैं ? ध्यान रहे, माया अपना कार्य बहुत निपुणतासे करती है, इससे निकलने हेतु जो प्रयत्न किए जाते हैं, उसे पुरुषार्थ कहते हैं और यह पुरुषार्थ जिस दिवससे साधना और धर्मका महत्त्व ज्ञात हो, उसे उसी क्षणसे करना चाहिए; क्योंकि यह जीवन नश्वर है और मृत्युका समय भी अज्ञात है !
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