हिन्दुओ, साधना एवं धर्माचरण करने हेतु कष्ट उठाना और अपनी अडचनोंपर उपाय योजना निकालना सीखें !
आजके अधिकांश व्यक्तियोंमें समस्याओंकी योग्य उपाययोजना निकालनेका अनेक बार अभाव दिखाई देता है और विशेषकर यदि साधना और धर्मपालन करना हो तो उसे कोई उपाय सूझता ही नहीं है । मैं सदैवसे ऐसे सोचती आई हूं कि इस ब्रह्माण्डमें ऐसी कोई समस्या ही नहीं है, जिसका समाधान सम्भव नहीं हो; अतः मेरे जीवनमें आनेवाले भिन्न समस्याओंका मैं सहज ही समाधान निकाल लिया करती हूं और कष्टप्रद परिस्थितिमें भी इसलिए आनन्दमें रहती हूं, मेरे लिए प्रत्येक समस्या एक चुनौती होती है और उसका समाधान ढूंढकर उसपर विजय पाना अब मेरी वृत्ति बन गई है । किन्तु आज कुछ व्यक्तिके अपनी छोटी-छोटी समस्याओंके विषयमें ऐसे बताते हैं कि मुझे उनके बुद्धिजीवी होनेपर भी प्रश्नचिन्ह निर्माण होने लगता है, जैसे एक पुरुषको मैंने कहा कि जब आप आश्रम आते हैं तब तो ‘कमसे कम’ कुर्ता पहन कर आ सकते हैं, इससे आपके ऊपर धर्माचरणका संस्कार अंकित होगा व इससे आपका मन एवं बुद्धिका आवरण नष्ट होगा तो वे झटसे अपनी समस्या बताते हुए कहने लगे, “मैं अपने कार्यालयसे सीधे आश्रम आता हूं, ऐसेमें मेरे लिए कुर्ता पहन कर आश्रम आना सम्भव नहीं है ।” वे स्वयंका एक छोटासा संगणकीय व्यवसाय सम्भालते हैं । मैंने उनसे कहा, “आप अपने कारयानसे आते हैं न, तो एक थैलीमें कुर्ता रखें और आश्रम आनेपर उसे धारण करें !” और उन्होंने ऐसा करना आरम्भ किया !
एक दूसरे व्यक्तिने कहा, मैं ‘व्हाट्सएप’पर आपका सत्संग सुनना तो चाहता हूं; किन्तु मेरे पास १५ मिनिटका भी समय नहीं होता ।” मैंने उनसे कहा, “आप तीन बार भोजन करते हैं न” तो उन्होंने कहा, “हां,” तो भोजन करते समय मौन रखना चाहिए ऐसा शास्त्र कहता है; अतः तीन समयमेंसे एक समय सत्संग सुनें ।” वे मेरे इस सरलसे समाधानसे आश्चर्यचकित थे । एक तीसरे व्यक्तिने कहा, “मैं स्वयंसूचना देना तो चाहता हूं, किन्तु भूल जाता हूं ।” मैंने कहा, “आप चलभाषका प्रयोग करते हैं क्या ?” तो उन्होंने कहा, “हां करता हूं” तो मैंने कहा, “उसमें संकेतध्वनि (अलार्म) लगाकर रखें और यह संकल्प लें कि बिना स्वयंसूचना दिए मैं भोजन नहीं करुंगा । दो दिवस भूखें रहेंगे तो मन अपने आप डर जाएगा और आपकी स्वयंसूचनाएं नियमित होने लगेगी ।”
एक स्त्रीने कहा, मैं साडी पहनना तो चाहती हूं; किन्तु मुझसे वह सम्भालती नहीं है,” मैंने कहा, “क्या आपकी माताजी साडी पहनती हैं ?” तो उन्होंने कहा, “हां, उन्होंने तो आज तक कोई दूसरे प्रकारके वस्त्र धारण ही नहीं किए हैं ।” मैंने कहा “अनादि कालसे भारतीय नारीने ६ या ९ गजकी साडी डालकर धान रोपे हैं, यज्ञ-पूजन किया है, युद्ध किया है तो आजकी नारी उसे क्यों नहीं सम्भाल सकती हैं; क्योंकि वे उसे सम्भालना नहीं चाहती हैं; अतः पहले आप सप्ताहमें एक दिवस साडी डालें, उसके पश्चात दो दिवस डालें तत्पश्चात प्रतिदिन चार-पांच घण्टेके लिए डालें एवं धीरे-धीरे प्रतिदिन डालें । प्रतिदिन साडी धारण करनेसे स्त्रियोंके भीतर दैवी तत्त्व आकृष्ट होता है एवं उनकी जननेन्द्रियोंपर दैवी कवच रहता है ।” उन्होंने कहा, “जी आपके कहे अनुसार प्रयास करती हूं ।” आपमेंसे कुछ लोग मेरी ये बातें पढकर हंस रहे होंगे; किन्तु मैं आपको मात्र यह बताना चाहती हूं कि आजके लोगोंकी वृत्ति समस्याके निवारणपर केन्द्रित नहीं रहती अपितु सदैव समस्या बतानेपर रहती है । इस संसारमें कुछ भी करना असम्भव नहीं है, मात्र आपकी सोचकी एवं प्रयासकी दिशा योग्य होनी चाहिए और यदि आपको समाधान नहीं समझमें आता है तो किसीसे उस समस्याका समाधान पूछ कर लें ! इन प्रसंगोंके एक और बात ध्यानमें आती है कि आजका हिन्दू तमोगुणी होता जा रहा है । वह धनप्राप्तिके लिए सर्व कष्ट उठानेको या सर्व उपाय निकालनेको सिद्ध रहता है; किन्तु साधना एवं धर्माचरण करने हेतु न ही वह कष्ट उठाना चाहता है और न ही कोई उपाय निकालना चाहता है ! हिन्दुओ ! धर्मपालन एवं साधना हेतु कष्ट उठानेके वृत्ति निर्माण करें; क्योंकि इससे ही नि:श्रेयस (परम कल्याण) सिद्ध हो सकता है और इसीसे आपका और समाजका उद्धार हो सकता है ! (२०.१.२०१७)
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