आपातकालमें साधनाके सन्दर्भमें व्यायामका महत्त्व


‘स्थूलसे सूक्ष्म श्रेष्ठ’ है, यह आध्यात्मका एक सिद्धान्त होनेसे इतने वर्ष मैं साधकोंको स्थूलदेहके व्यायाम करनेको नहीं कहता था । इसके स्थानपर देहसे सूक्ष्म, मन एवं बुद्धिको प्रथम सात्त्विक बनाने और तत्पश्चात उनका लय करने हेतु साधना करनेको कहता था। अब यह ध्यानमें आया कि राष्ट्र एवं धर्मके रक्षणार्थ एवं साधना हेतु स्थूलदेह (शरीर) सक्षम होना आवश्यक है । इसलिए साधकोंको प्रतिदिन व्यायाम करना आवश्यक है । व्यायामसे अनिष्ट शक्तियोंका आवरण नष्ट होनेमें भी सहायता मिलती है । ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ।’ (संदर्भ : कुमारसम्भव, सर्ग ५, श्लोक ३३), अर्थात धर्माचरण करने हेतु शरीर ही प्रथम साधन है और वह कितना योग्य है ?, यह ज्ञात हुआ । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था



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