साधना क्यों करें ? (भाग – ११)


साधक माता-पिताके घरमें जन्म लेने हेतु जीवात्माओंकी होड लगी रहती है । वहीं जो माता-पिता साधना नहीं करते हैं, उनके घरमें जीवात्माएं जन्म ही नहीं लेना चाहती हैं, उन्हें ज्ञात होता है कि ऐसे घरोंमें जन्म लेनेका अर्थ है, दुःख भोगना और अनेक बार उन्हें ईश्वरीय विधान अनुसार बलात (जबरदस्ती) बिना अपनी इच्छाके, मात्र अपने प्रारब्धको भोगने हेतु जन्म लेना पडता है ! पूर्वकालमें स्त्रियां जब गर्भवती होती थीं तो घरके सभी वयोवृद्ध उन्हें साधना करने हेतु कहते थे और उनकी साधना हो इस हेतु वे प्रयास भी करते थे; इसलिए तेजस्वी जीवोंका जन्म होता था । तेजस्वी जीव अपने साथ सुख-समृद्धि, कुलके लिए सम्मान अपने साथ लाते हैं एवं माता-पिताको साधना हेतु प्रवृत्त भी अपने गर्भकालसे ही करते हैं । जैसे हमारे एक निकट सम्बन्धीका आध्यात्मिक स्तर ६१ % प्रतिशत है, वह ज्ञान मार्गसे साधनारत है । जब उसकी पत्नी गर्भवती थी तो उसे गुरु चरित्र पढनेकी इच्छा हुई और वह उसे अपनी गर्भवती पत्नीको भी सुनाने लगा । उसने एक दिवस मुझसे दूरभाष कर कहा, पता नहीं मैं कैसे श्रीगुरु चरित्रका पाठ करने लगा हूं और मुझे उसे पढनेमें तो आनन्द आ ही रहा है मैं उसे अपनी पत्नीको भी सुना रहा हूं । उन पति-पत्नीका अहं न बढ जाए, इसलिए मैंने उन्हें मात्र ‘बहुत अच्छा है’, इतना ही कहा । वस्तुत: गर्भस्थ शिशुका आध्यात्मिक स्तर ६१ % है, वह वर्तमान कालके एक उच्च कोटिके गुरुका शिष्य है और उनका कार्य करने हेतु जन्म ले रहा है; इसलिए उसे श्रीगुरु चरित्रका पाठ सुननेकी इच्छा हुई और उसने यह बात अपने पिताजीके मनमें डाल दी । आगे उसने बताया कि गुरु चरित्रके पश्चात वह  भिन्न उपनिषदोंका अभ्यास कर रहा है और अपनी पत्नीको उसका अर्थ सुनाता है ! वह गर्भस्थ शिशु पूर्व जन्मोंमें तीन वेदोंका अभ्यास कर चुका है तो वह तो उपनिषद ही पढने या सुनने हेतु इच्छुक होगा ! उसके जन्मके पश्चात उनके जीवनमें अनेक सुखद परिवर्तन आए हैं ।
अपने आध्यात्मिक शोधमें मैंने ऐसे अनेक प्रकरण देखे हैं, जब उच्च कोटिके जीव अपने माता-पिताको साधना करने हेतु प्रवृत्त करते हैं या उन्हें उच्च कोटिके अध्यात्मविदोंसे जोड देते हैं, जिससे उसकी साधना बाल्यकालसे ही आरम्भ हो, मैं इन सबका संकलन ‘सूक्ष्म जगत’ नामक ग्रन्थमें कर रही हूं ! ध्यान रहे, जब तक कोई शिशु स्पष्ट रूपसे बोलता नहीं है एवं यदि वह उच्च कोटिका साधक हो तो उसकी सूक्ष्म इन्द्रियां १०० प्रतिशत कार्यरत रहती हैं । बच्चा जब बोलने लगता है तो अहंके जागृत होनेपर ही सूक्ष्म इन्द्रियोंपर आवरण आता है और वह अपेक्षाकृत अल्प प्रमाणमें कार्य करती हैं ! जिस गर्भस्थ शिशुके विषयमें मैंने आपको बताया, उसकी साधनाकी एवं अध्यात्मिक स्तरकी पुष्टि हेतु दो प्रसंग बताती हूं । २६ अक्टूबर २०१५ में देहलीमें भूकम्प आया था ! वह अपने विद्यालयमें था, अकस्मात उसने अपनी शिक्षिकासे कहा, “अभी कुछ देरमें सब कुछ हिलने लगेगा और हम लोग बहुत भयभीत हो जाएंगे !” दस मिनिटके पश्चात ही भूकम्प आया और सभी बच्चे व शिक्षिका भयसे चीखने और भागने लगे ! उस शिक्षिकाने उस बच्चेकी माताजीको दूरभाष कर अपना आश्चर्य प्रकट करते हुए यह सब बताया !
वह हमारे देहलीके आश्रममें आया करता था । एक दिवस वह कुछ क्षणोंके लिए आश्रममें लेटा था एवं दस मिनिटमें ही वह अपनी मांको ऊंचे स्वरमें बार-बार बुलाने लगा ! उसने अपनी मांको कहा, “मां, मैंने देखा कि सर्वत्र आगकी लपटेंं निकल रही हैंं, सभी लोग ईधर-ऊधर भाग रहे हैं, बहुत लोग जल गए हैंं और मर गए हैं ! मैं देख नहीं सका, इसलिए अपने नेत्र खोल दिए ।” आश्रममें चैतन्य होनेके कारण उसका ध्यान लग गया था और उसे आगामी भीषण कालके दृश्य दिखाए दिए, जिससे उसका बालमन विचलित हो गया था !
इन अनुभूतियोंको यहां बताना इसलिए आवश्यक था कि आपको समझमें आ सके कि तेजस्वी जीवकी क्षमता क्या होती है ? (क्रमश:)



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2017. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution